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राजा और प्रजा।
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हम पहले ही कह चुके हैं कि जिसमें जोड़नेकी शक्तिका अभाव है, तोड़नेका प्रयास उसके लिए मृत्युस्वरूप है । हम पूछते हैं, हमारे देशमें यह गठनतत्त्व कहाँ प्रकाशित हो रहा है। हमको संगठित और एक रखने के लिये कौन सृजनी शक्ति हमारे अभ्यन्तरमें काम कर रही है ! भेदके लक्षण ही तो चारों ओर दिखाई दे रहे हैं। जबतक हममें विच्छिन्नताकी ही प्रबलता है तबतक सब कुछ करके भी हम अपना प्रभुत्व प्रतिष्टित न कर सकेंगे और तब दूसरे हमपर प्रभुता करेंगे ही, हम किसी प्रकार उनको इससे रोक नहीं सकेंगे। बहुतोंके विचारमें इस देशकी पराधीनता शिरःपीड़ाकी तरह भीतरकी बीमारी नहीं है, एक बोझ है जो अँगरेज सरकारके रूपमें बाहरसे हमारे सिरपर लाद दिया गया है,-यदि हम किसी उपायमे एक बार इसको कहीं पटक दे सकें, तो सदाके लिये हल्के हो जायें। पर यह काम इतना सहज नहीं है। ब्रिटिश सरकार हमारी पराधीनता नहीं है, वह हमारी गम्भीरतर पराधीनताका प्रमाण परन्तु गम्भीरतर कारणोंकी छानबीन करनेका अवकाश या इच्छा आजकल हमको नहीं है । इतनी भिन्न भिन्न जातियोंक रहते हुए भी किस प्रकार भारतमें एक महाजाति बनकर स्वराज्यकी स्थापना करेगी ! जिस समय यह प्रश्न किया जाता है; उस समय हममेंसे कई एक जल्दबाज इस तिरछी पगडंडीसे झट मंजिलपर पहुँच जाते हैं कि स्विटजरलैण्डमें भी तो अनेक जातियाँ बसती हैं, पर क्या इससे वहाँ स्वराज्य-स्थापनामें बाधा पड़ी।



मन्दिर तोड़वाए । हिन्दुओंको इसने जितना सताया उतना शायद ही और किसी मुसलमानने सताया हो। बंगाल में लोगों का विश्वास है कि यह जन्मसे ब्राह्मण था । नवाबकी कन्यापर आसक्त होकर मुसलमान हो गया था। पर फारसी इतिहासोंमें इसे पठान लिखा है ।-अनु०।