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राजा और प्रजा। १९२

दूसरी ओर बेपरवाई और अवज्ञाका राज्य उतना ही अटल होता जाता है। यदि दुर्भाग्यवश यही अवस्था स्थायी हो गई तो निश्चित है कि एक न एक दिन अन्धड़को अवश्य बुला लावेगी।

इस प्रकार इन कई एक समानताओंके रहते हुए भी हमें यह कहना पड़ेगा कि विप्लवके पहले अमेरिका और फ्रान्सके सामने जो समस्या उपस्थित थी और फलतः जिसकी मीमांसापर ही उनकी मुक्ति पूर्ण रूपसे निर्भर करती थी; हमारे सामने वैसी समस्या नहीं है। अर्थात् विनयानुनय करके या लड़-भिड़कर जबरदस्ती यदि हम अँगरेजोंको भारतसे बोरिया-विस्तरा समेटनेके लिये राजी या बाध्य करनेमें सफल हो जायँ, तो भी हमारी समस्याकी मीमांसा न होगी—या तो अँगरेज ही फिर आ धमकेंगे या ऐसे दूसरे पधारेंगे जिनके पेटकी परिधि और मुँहका ग्रास अंगरेजोंकी अपेक्षा छोटा न होगा।

यह कहना निष्प्रयोजन होगा कि जो देश महाजातिका निर्माण नहीं कर सकता वह स्वाधीन होनेका अनधिकारी है—स्वाधीन हो ही नहीं सकता। क्योंकि उसके पास स्वाधीनतामेंका 'स्व' पदार्थ कहाँ है? स्वाधीनता, किसको स्वाधीनता? बंगालियोंके स्वाधीन हो जानेसे दक्षिणकी नायर जाति अपने आपको स्वाधीन नहीं समझेगी; जाटों की स्वाधीनताका फल आसामी पानेकी आशा नहीं करेगा। दो भिन्न भिन्न प्रान्तोंकी बात जाने दीजिए। एक बंगालमें ही हिन्दूके साथ मुसलमान अपना भाग्य एक करनेके लिये तैयार हैं, ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखलाई देता। तब स्वाधीन होगा कौन? हाथके साथ पैर, और पैरके साथ सिर यदि अपना हिसाब बिलगाने लग जायें तो लाभ नामक वस्तुका अधिकारी कौन रह जायगा?