पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१०१

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राबिन्सन क्रूसो ।

८६ .राबिन्सन क्रस हूं। इतने में देखा कि एक मनुष्य काले बादल के भीतर से निकल कर आग के रथ पर चढ़ा हुआ नीचे की ओर आ रहा है । उस मनुष्य का शरीर भी तेजोमय था। ऐसा देदीप्यमान कि मैं उस ओर देख नहीं सकता था । उस व्यक्ति का मुंह और मैहें बहुत टेढ़ी थीं । रूप अत्यन्त भयहर था। उसके धरती पर पैर रखते ही खूब जोर से भूकम्प होने लगा और आकाश से तार टूट टूट कर गिरने लगे । वह भयानक रूप धारी व्यक्ति धरती पर उतरते ही मेरी ओर अग्रसर होने लगा। उसके हाथ में एक अग्निमय जलता हुआ त्रिशूल था । वह मेरी ओोर शल उठा कर वज़खर से बोला –“ अरे पापिष्ट ! क्या इतने पर भी तेरे मन में अनुताप न हुआ। ता अब तू मर ।’ यह कह कर वह शूल लेकर मुझको मारने पर उद्यत हुआ । उस समय मेरे मन में जैसा डर हुआ था उसे मैं इस समय किसी तरह कह कर समझाने में अक्षम हैं । निद्रित अवस्था में जो मुझे भय हुआ था वह तो हुआ ही था, जागने पर भी घंटों तक कलेजा धड़कता रहा। उसकी वह भयकर मूर्ति और वह बजेस्वर अब भी जी से नहीं भूलता। मैं यथार्थ में अभागा हूं। क्योंकि ईश्वर के सम्बन्ध में मेरा कई ज्ञान न था। मैंने अपने पिता से जो कुछ शिक्षा पाई थी वहइतने दिन कुसंगति में पड़े रहने से, एकदम लुप्त हो गई थी । सम्पत्ति में ईश्वर से डरना, विपत्ति के समय उन्हीं के ऊपर निर्भर होकर रहना, और विपदा से मुक्त होने पर हृदय से उनका कृत होना मैंने नहीं सीखा । इतने दिन जो भाँति भाँति के क्लश सह रहा हूं, वह मेरे ही पाप का फल है या