पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१०३

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राबिन्सन क्रूसो।

२८ जून--सोने से कुछ आराम पा कर मैं जाग उठा। ज्वर उतर चुका था। स्वप्न में जो भयङ्कर दृश्य देखा था वह जागने पर भी आँखों के सामने मानो नाच रहा था। यद्यपि स्वप्न का प्रभाव तब भी मेरे मन में पूर्ण-रूप से विद्यमान था। तथापि यह जान कर कुछ धैर्य हुआ कि ज्वर आने की पारी कल होगी। आज जहाँ तक हो सके कल के लिए सब चीज़ों का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए। सबसे पहले एक बड़ी चौपहलू बोतल में पानी भर कर सिरहाने के समीप टेबल पर रख दिया और पानी का विकार दूर करने के लिए उस बोतल में थोड़ी सी शराब डाल दी। इसके बाद बकरे का मांस पकाया, पर अरुचि के कारण कुछ खा न सका। मैं धीरे धीरे टहलने लगा। किन्तु शरीर अत्यन्त दुर्बल था और मन चिन्ता के बोझ से दबा हुआ था। कल फिर ज्वर की यातना भोगनी पड़ेगी, इस भावना से चित अत्यन्त दुखी था। रात में कछुए के तीन अंडों को पका कर खाया। मैंने अपने जीवन में आज ही पहले पहल भगवान् को निवेदन कर के भोजन किया।

मैंने ज़रा बाहर घूमने की चेष्टा की। परन्तु दौर्बल्य इतना था कि मैं बन्दूक़ न उठा सका। बिना बन्दूक़ लिये मैं कभी बाहर टहलने नहीं जाता। इससे निरस्त हो कर कुछ दूर आगे जा धरती पर बैठ रहा। देखा, सामने अनन्त उदार नीला समुद्र है, माथे के ऊपर अनन्त नील आकाश है, इन दोनों के बीच मैं एक क्षुद्रत्तम जीव हूँ। तब मेरे जी में यह भावना होने लगी कि यह जो विशाल समुद्र-मेखला पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए है, ये जो कितने ही देश भिन्न भिन्न प्रकार के दिखाई देते हैं, ये सब क्या हैं? इन की उत्पत्ति कहाँ से कैसे