पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१०५

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राबिन्सन क्रूसो ।

राबिन्सन ब्रसे। - 5 कोई औषध क्यों न हो वह बीमारी में कुछ न कुछ फ़ायदा कर सकता है । मैं पहले थोड़ी सी तम्बाकू लेकर चबाने लगा । तम्बाकू खाने की मुझे आदत न थी, इससे थोड़ी ही देर में सिर घूमने लगा। इसके बाद मैंने थोड़ी सी पत्ती का शराब में भिगो कर रक्खा । यह इसलिए कि उसे सेने के समय पीऊंगा। आख़िर मैंने एक मलसे ( मिट्टी के बर्तन ) में तम्बाकू रख कर आग पर रख दी । तम्बाकू जलने पर उसका धुआं आप ऊपर की ओर उठने लगा । में उस धुएँ का गन्ध ग्रहण करने लगा। किन्तु मैं चाग का उत्ताप और उस धुएँ का उत्कट गन्ध सहन न कर सका। इसके बाद मैंने पढ़ने की इच्छा से बाइबिल हाथ में ली, परन्तु मेरा सिर इस कदर घूम रहा था कि पढ़ न सका । पेथी खोलते ही जिस जगह दृष्टि पड़ी बहाँ लिखा हुआ थ—संकट में मेरी शरण गहो, मैं तुमक संकट से उबारेंगा और तुम मेरी महिमा का कीर्तन करोगे। यह बात मेरे जी में बहुत ठीक ढंची । यह मेरे मन में एक तरह से अस्त होगई, किन्तु ’’ शब्द का ठीक 'उबारूग अर्थ उस समय मेरी समझ में न आया। अपना उद्धार होना मुझे इतना असंभव मालूम होता था कि मेरे अविश्वासी मन में ये प्रश्न उठने लगा-क्या ईश्वर यहाँ से मेरा उद्धार कर सकेंगे ? यद्यपि बहुत दिन से उद्धार होने की कोई संभावना देख नहीं पड़ती थी तथापि आज से मेरे मन में इस वाक्य पर कुछ कुछ भरोसा होने लगा । तम्बाकू का नशा मेरे स्तिष्क पर अपना पूर्ण अधिकार जमाने लगा। मेरी आंखें झपने लगाँ। लेने के पहले मैंने