पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१०७

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राबिन्सन क्रूसो।


की किस्म के दो जल-पक्षियों को मार कर घर लौट आया । किन्तु उनके खाने की इच्छा न हुई। कछुए का अण्डा खाया। खाने में बहुत अच्छा लगा। आज भी सेाने के समय तम्बाकू मिली थोड़ी सी शराब पी ली । तो भी दूसरे दिन कुछ जाड़ा मालूम हुआ । पर ज्वर का वेग प्रबल न था। आज पहली जुलाई थी।

दूसरी जुलाई-आज तम्बाकू का त्रिविध प्रक्रिया से अर्थात् चूर्ण,धूम और काढ़ा बना कर सेवन किया।

ज्वर एकबारगी जाता रहा । किन्तु पूर्ववत् बल प्राप्त करने में कई सप्ताह लगे । मेरे मन में हमेशा ही इस बात का स्मरण बना रहने लगा, “मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा।" मैं इस विपत्ति से उद्धार पाने की चिन्ता से ऐसा व्याकुल हो उठता था कि पहले की कई बार की विपदाओं से उद्धार पाने की बात एकदम भूल जाता था। किन्तु कुछ ही देर में चैतन्य होने पर मेरा चित्त कृतज्ञता से फूल उठता था । आज हाथ जोड़ कर और घुटने टेक कर भगवान् को, रोग मुक्ति के लिए, मैंने धन्यवाद दिया ।

मैं अब सुबह और शाम दोनों वक्त बाइबिल पढ़ने लगा और अपने व्यतीत जीवन की अधार्मिकता पर अत्यन्त व्यथित और लज्जित होने लगा । मैं स्वप्न की बात स्मरण कर के भगवान् से क्षमा की भिक्षा माँगता, अपने पाप पर बार बार अनुताप करता और एकाग्र मन से ईश्वर का ध्यान करता था । मनुष्य-जीवन की सार्थकता के लिए यही मेरी प्रथम उपासना थी, भगवद्-वाक्य में यही मेरा प्रथम विश्वास था। भगवान् मेरी प्रार्थना सुनेंगे, इस आशा का आरम्भ इसी समय से मेरे मन में हुआ।