पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१०९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है
९४
राबिन्सन क्रूसो ।

१४ राबिन्सन क्रो । समय इस टापू को एक बार अच्छी तरह देखने की । इच्छा हुई । १५ जुलाई से मैंने इस द्वीप की देख भाल करना आरम्भ किया । मैं जिस जगह खाड़ी के भीतर बेड़े से उतरा था उस खाड़ी में कछार ही कछार जाकर देखा कि उसके किनारे कहीं कहीं हरित क्षेत्र हैं । एक जगह देखा कि तम्बाकू के बड़े बड़े पेड़ बहुतायत से उगे हैं। कई एक पेड़ जंगली ऊख के भी देख पड़े। आज यहीं तक देख कर लौट आया। दूसरे दिन और आगे बढ़ कर एक जंगल से घिरी हुई जगह पहुँचा। वहाँ पेड़ में भाँति भाँति के परिचित और अपरिचित फले हुए फलों को देख कर मैं आह्वादित अत्यन्त हुआ । परिचित फलों में देखा कि कितने ही पक्के तरबूज़ लगे हैं और रस से परिपूर्ण आहूर के गुच्छे के गुच्छे पके हुए हैं । यह विचित्र मधुमय आविष्कार देख मैं अंगूर के गुच्छे तोड़ कर खाने लगा। मैं जानता था कि अधिक अंगूर खाने से कितने ही लोगों को ज्वर हो जाता है और उससे उनकी मृत्यु हो जाती है । इस भय से मैंने अधिक नहीं खाये । मैंने इन फलो का संग्रह करना चाहा, और उन्हें सुखा कर किस मिंस की तरह रखना चाहा । इन्हें सुखा कर रखने से यह लाभ सोचा कि जब अंगूरों का समय न भी रहेगा तब भी मधुर और पुष्टिकारक खाद्य की कमी न होगी । मैंने सारा दिन वहीं बिताया । रात के भी घर लौट कर नहीं आया । इस द्वीप में प्रथम दिन जैसे पेड़ पर चढ़ कर रात बिताई थी उसी तरह आज की रात भी बिताई । सवेरे उठ कर लगातार चार मील उत्तर ओर जाकर एक पहाड़ की तल