पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१२०

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द्वीप का पुनर्दर्शन। १०३ सदृश जानवर नज़र आते थे। मैंने कई एक खरगोश मारे परन्तु वे ऐसेविचित्र शकल के, थे कि उनको खाने की प्रवृत्ति न होती थी । मज़बूरी हालत में पड़ कर ही लोग ऐसी वस्तु खाते हैं जो खाने के लायक नहीं । अब भी मुझे खाद्य पदार्थ का आभाव न था । बकरे, कबूतर और कछुए - जिन्हें मैं खूब पसन्द करता था—बहुतायत से पाये जाते थे, इसलिए अनाप शनाप चीज़ खाने की मु आवश्यकता न थी। मेरी अवस्था यद्यपि अत्यन्त शोचनीय थी तथापि खाद्य-वस्तुओं की कमी न थी, इस कारण मैं हृदय से ईश्वर का कृत था । मैं एक दिन में दो मील से अधिक रास्ता नहीं चलता था । किन्तु देश की दशा देखने के लिए मैं दिन भर इस प्रकार घूमता रहता था कि रात बिताने के अड्डे पर आते आते एकदम थक कर पड़ रहता था । पेड़ के ऊपर या जमीन में थोड़ी सी जगह घेर कर उसके भीतर रात बिताता था जिसमें कोई जन्तु मेरी निद्रित अवस्था में मुझ पर एकाएक आक्रमण न कर सके। इस तरफ समुद्रतट पर आकर देखा, कछुए और पक्षी बहुत थे। पक्षी प्रायः सब मेरे पहचाने हुए थे । जो परिचित न भी थे उनका भी मांस बहुत स्वादिष्ठ था। तब मैंने समझा कि जिधर द्वीप का सब से ख़राब अंश था उधर ही मैंने घर बनाया है । वहाँ डेढ़ वर्ष के भीतर मु इने गिने तीन कछुए मिले थे । मैं जितना चाहता उतना पक्षियों का शिकार कर सकता था। किन्तुबारू-गोली शीघ्र चुक जाने की आशका से