पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१५७

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राबिन्सन क्रूसो ।

१४० राबिन्सन क्रसे। कि ईश्वर दयालु और मझलमय हैं इसलिए मैंने उनके इस विधान को शुभ मान लिया। तब मुझे बाइबिल के उस मधुमय वाक्य का स्मरण हो आया-विपत्ति में मेरी शरण गहो, में विपत्ति से तुम्हें छुड़ाऊँगा और तुम मेरी महिमा का प्रचार करोगे। [‘आपि चेत् मुदुराचारो भजते मामनम्यभाक्। साधुव स मन्तव्यः सम्यग्यवहितोपि सः ॥ शीघ्र भवति धर्मात्मा शवच्छान्ति निगच्छुति । कौन्तेय प्रतिजानीति न मे भक्तः प्रणश्यति ’ अर्जुन के प्रति भगवान् श्रीकृष्ण का कहा हुआ यह वाक्य बाइबिल के उपयुक्त वाक्य से कुछ मिला जुला सा प्रतीत होता है । अस्तु ] ऐसा ही सेच विचार करते कई सप्ताह बीत गये । किसी तरह वह सुन्दर उपदेश चिल से न हटता था। एक दिन एकाएक मेरे मन में यह भावना हुई कि वह पदचिह्न मेरा ही ते न था १ जब मैं नाव से उतरा था तब का तो चिह्न नहीं है ? इस बात का ख्याल होते ही मेरा मन प्रफुल हो उठा । भय दूर हुआ । मैंने अकारण इतना लश पाया । अपनी इस मूर्खता पर मुझे बड़ी हँसी आई । कितने ही गाँ आदमी जैसे अपनी छाया को देख कर भूत के भय से अभि भूत होते हैं उसी तरह मैंने अपना पदचिह्न देख कर भय से इतना क्लश पाया । मारे हँसी के मैं लोट-पोट हो गया। कितने ही लोग भ्रम में पड़ कर ऐसे ही भाँति भाँति के क्लश सहते हैं। इस नई भावना से साहस पा कर तीन दिन बाद में फिर बाहर निकला। घर में कुछ खाने की वस्तु भी न थी,