पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१५८

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अपरिचित पदचिह्न । १४१ । और इस बात का स्मरण हुआ कि तीन दिन से बकरियों का दूध भी नहीं दुहा गया है । न मालूम उससे उन्हें कितना कष्ट होता होगा। सम्भव है, कितनी ही बकरियां का दूध एक दम सुख गया हो । सब सेच विचार कर किले से बाहर निकला। बाहर तो निकला पर एकदम निर्भय नहीं हुआ । कुछ दूर आगे जाता और फिर पीछे की ओर ताकता था। किसी किसी दफ़ पीठ पर की टोकरी फेंक कर घर भाग जाने को जी चाहता था। इस प्रकार डरता हुआ दोतीन दिन तक घर से बाहर मायागया। डरने की जब कोई जगह न देखी तब मन में कुछ विशेष साहस हुआ और उस पदचिह्न को देखने के लिए फिर समुद्रतट पर गया । जा कर देखाजहाँ पैर का चिह्न आज वहाँ ख़ाली पैरों में कभी नहीं गया था, दूसरे मेरा पैर भी उतना लम्बा न था । इससे मेरा हृदय फिर भय से काँप उठा। मैं अपने हुकम्प को किसी प्रकार न रोक सका। मेरा सम्पूर्ण शरीर थर थर काँपने लगा। तब मैंने अपने मन में यही समझा कि इस द्वीप में कोई बाहर का आदमी आया है या इसी द्वीप के किसी अंश में मनुष्य का निवास है । सम्भव है, किसी दिन एकाएक किसी मनुष्य से भेंट हो जाय। अब मैं अपनी रक्षा के लिए क्या उपाय कर्लोइसका कुछ निश्चय न कर सका। डरने से लोगों की बुद्धि लोप हो जाती है । पहले मन में यही आया कि घेरे को तोड़ ताड़ कर बकरों को जहूल में भगा दें, खेत को खोद कर उजाड़ डाईं और कुजभवन आदि स्थान को नष्ट भ्रष्ट कर दें। इससे कोई मेरा पता न पावेगा । कुछ देर के बाद खूब सोच कर देखा तो जान पड़ा कि ऐसा करने से उस विपत्ति की अपेक्षा लाख गुना अधिक विपत्ति का भय उठ खड़ा हेग। मैं वैसा कुछ न कर सका।