पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१६८

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गुफा का आविष्कार । १५१ खड़ा हो सकता था तथा दो आदमी और भी मेरे पास ही पास खड़े हो सकते थे । यह गुफा देख कर मेरे आनन्द की सीमा न रही। मैंने इसी के भीतर अपना गुप्तस्थान बनाने का निश्चय किया । यदि कोई असभ्य इस कन्दरा के मुंह के पास तक आवेगा तो भी वह सहसा इसके भीतर प्रवेश करने का साहस न करेगा । मुझको छोड़ दूसरा कोई इसके भीतर घुसने का साहस करता या नहीं, इसमें सन्देह है। मैंने गुफा के भीतर प्रवेश किया । भीतर भयानक श्रन्ध कार था । अच्छी तरह देखने के लिए आंखें फाड़ कर देखा कि किसी के दो नेत्र उस अन्धकार में तारों की तरह चमक रहे हैं। वह मनुष्य था य शैतान १ कौन जाने क्या था ? मैंने उसके शरीर का और आकार तो देखा नहीं, देखा सिर्फ वही एक आहुत ज्योतिर्मय पदार्थ । तब मैं एक ही छलाँग में कूद कर गुफा के बाहर निकल आया । कुछ देर के बाद सँभल कर फिर मैंने साहस किया । एक धधकती हुई लकड़ी लेकर मैं गुफा के भीतर घुसा। तीन चार डग जात न जाते एक कटजनक दीर्घश्वास और करहने का शब्द सुन कर मैं फिर पूर्ववत् डर गया । मेरा शरीर पसीने से तर बतर हो गया । बार बार रोमश्च होने लगा। कुछ देर बाद फिर साहस किया और यह सचा कि भगवान सर्वत्र रक्षक हैं—'जाको राखे साँइयाँ मारि स महैिं केय 7 मैं फिर गुफा में गया और उस प्रज्वलित लकड़ी को ऊपर उठा कर देखा कि एक बहुत बूढ़ा बकरा मरणासन्न पड़ा है । मैंने उसे हाथ से ज़रा ढकेला, तो उसने उठने की चेष्टा की, पर वह उठ न सका । तब मैंने कहा कि अच्छा,