पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१६९

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राबिन्सन क्रूसो।


इसे यहीं पड़ा रहने दो। यदि कोई साहस कर के भीतर आवेगा तो मेरी ही भाँति भयभीत होगा।

मैंने अब स्थिर होकर अच्छी तरह देखा। गुफा बहुत बड़ी न थी, ज़्यादा से ज़्यादा भोतर का विस्तार बारह फट होगा। वह न गोल थी न चौकोर, उसका कोई निर्दिष्ट आकार न था। गुफा के एक तरफ़ एक पतली सुरङ्ग थी। कौन जाने, वह कहाँ कितनी दूर तक गई है। आज मेरे पास बत्ती न थी, इससे आज उसके भोतर न गया। कल बत्ती और चकमक साथ में लेकर इसमें प्रवेश करूँगा। इसके भीतर घुटनों के बल जाना होगा।

दूसरे दिन अपने हाथ से बकरे की चर्बी की बड़ी बड़ी छः बत्तियाँ बनाईं। उन्हें साथ ले कर मैं गुफा के भीतर गया और घुटनों के बल सुरङ्ग में घुसा। लगभग दस गज़ भीतर घुस कर मैंने सोचा, कौन जाने में कहाँ जा रहा हूँ। कुछ और आगे बढ़ने पर सुरङ्ग की छत ऊँची देख पड़ी। मैंने खड़े होकर देखा, कि एक छोटी सी कोठरी है, ऊँचाई अन्दाज़न बीस फुट होगी। मैंने वहाँ जो विलक्षण दृश्य देखा, वैसा कभी कहीं न देखा था। इस गुफा की दीवार और छत से मेरी बत्ती के प्रकाश का लाख गुना प्रत्यालोक मेरे चारों ओर प्रतिफलित होने लगा। वह बड़ा उज्ज्वल और विचित्र था। बड़ा अद्भुत चमत्कार था। दीवारों में हीरे जड़े थे या सोने के पत्तर मढ़े थे-कुछ मालूम न हुआ। यह कोठरी बड़े आराम को थी। नीचे की ज़मीन खूब सूखी और साफ़ थी। बीच में पत्थर के टुकड़े बिछे थे। कहीं एक भी कीड़ा-मकोड़ा न था। यहाँ मेरे लिए एक मात्र प्रवेश