पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१७३

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राबिन्सन क्रूसो ।

१५६ राबिन्सन क्रसो । नाचने लगे । मैं दूरबीन के द्वारा उन लोगों का अन विक्षेप स्पष्ट रूप से देख रहा था । वे बिलकुल नन धड़ थे। एक भी वस्त्र उनके शरीर पर न था। वे लोग पुरुष थे या स्त्री, अथवा उनमें कितने पुरुष और कितनी स्त्रियाँ थीं, यह इतनी दूर से मैं नहीं जान सका। ज्वार आते ही उन लोगों ने नाव खोल दी और लगा ले कर नाव खेने लगे । उन लोगों को जाते देख कर मैं झटपट दोनों कन्धों पर दो बन्दूक, कमरबन्द में दो पिस्तौल और हाथ में नह्री तलवार ले कर जिधर उन नृशंस को देखा था' उधर खूब ज़ोर से दौड़ कर गया । इतना बड़ा बोझ ले कर वहाँ पहुँचते प्रायः दो घंटे लग गये। वहाँ जा कर देखा कि छोटी बड़ी सब मिला कर पाँच डोगियाँ आई थीं । वे सब की सब एक साथ समुद्र के अपर तट में जा रही हैं । कैसा भयडूर दृश्य है ! उस समय भी वहाँ आग के चारों ओर उन लोगों के प्रचण्ड आनन्द का कारण दग्ध नर मांस और नर-कपाल जहाँ तहाँ बिखरे पड़े थे। यह हृदयविदारक दृश्य देख कर उन नर-मांस-खादकों को मारने की प्रवृत्ति और भी प्रबल हो उठी । वे लोग कभी कभी यहाँ आते थे । इसके बाद पन्द्रह महीने तक उन लोगों के आाने का कोई चिह्न दिखाई नहीं दिया तो भी मैं बराबर भयभीत बना रहता था। सदा विपत्ति के भय से दबा रहना बड़ी विडम्बना है । इसकी अपेक्षा विपत्ति का आ जाना कहीं अच्छा है । मैं भी नर-खादकों के भय से मन ही मन पक्का नरघाती बन गया। इस दफ़ उन लोगों के आने पर किस उपाय से उन्हें मार डालना होगा, इसी की चिन्ता सदा मन में लगी रहती थी । रात में