पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/१८८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
१६७
भृत्य-प्राप्ति।


वह दो एक डग मेरी ओर आता और फिर खड़ा हो रहता। यों ही रुक रुक कर वह आता था और भय से थरथर काँपता था। शायद वह मन ही मन सोच रहा था कि जो दशा मेरा पीछा करनेवालों की हुई है वही अब की बार मेरी होगी। मैंने उसको इशारे से यथासंभव आश्वासन देकर फिर पुकारा। तब वह साहस कर के दस बारह कदम मेरी ओर पाता और झुक झुक कर प्रणाम करता था। मैंने फिर मुसकुरा कर इशारे के द्वारा उसको अपनी ओर बुलाया। आखिर डरते डरते वह मेरे पास आया। उसने धरती छकर बड़े विनीतभाव से प्रणाम किया और मेरा पैर उठा कर अपने सिर पर रक्खा। मैंने धरती से उठा कर इशारे से, जहाँ तक संभव था, उसे आश्वासन दिया। जिसको मैंने धक्का मार कर गिरा दिया था वह मरा नहीं था, सिर्फ मूच्छित हो गया था। अब वह धीरे धीरे सचेत हो कर उठ रहा था। यह देख कर उस विद्रावित ने मुझ से क्या कहा, उसका एक अक्षर भी मेरी समझ में न श्राया। फिर भी उसने मेरे कानों में मानो अमृत बरसाया। कारण यह कि पच्चीस छब्बीस वर्ष बाद आज ही पहले पहल मनुष्य का कण्ठस्वर सुन पड़ा। वह गिरा हुआ आदमी होश होने पर उठ बैठा। तब मेरा वह आनन्द जाता रहा। मैंने झट उसकी ओर बन्दूक उठाई। यह देख कर उस पलायित व्यक्ति ने मुझ से तलवार माँगी। मेरी कमर में नङ्गी तलवार लटक रही थी। मैंने उसको तलवार दे दी। तलवार लेकर वह एक ही दौड़ में अपने शत्र के पास गया और एक ही वार में उसका सिर धड़ से उड़ा डाला। वे लोग काठ की तलवार का इस्तेमाल कर के ही ऐसे सिद्धहस्त होते हैं। उनकी तलवार काठ की होती है सही, किन्तु