पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२५२

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जीवनवृत्तान्त के प्रथम अध्याय का उपसंहार। २२ कभी नहीं देखा था। वह भय से काँपने लगा। एक तो मार्ग चलने की थकावट, उस पर जाड़े की शिद्दत ! फफोले पर , मानो नमक छिड़का गया । रास्ते में अधिक बर्फ पड़ने लगी । जो मार्ग पहले दुर्गम्य था वह अब अगस्य हो गया । ठण्ड कम होने की आशा से हम लोग बीस दिन रास्ते में ठहर गयेकिन्तु शीत घटने की कोई सम्भावना न देख कर फिर अग्रसर हुए। सभी कहने लगे कि इस मौसम में इतना जाड़ा कभी नहीं होता था । मैंने समझायह सब मेरे ही दुर्भाग्य का फल है। रास्ते में एक पथप्रदर्शक से हमारी भेट हुई । उसने हम लोगों को ऐसे मार्ग से ले जाना स्वीकार किया कि जिस रास्ते में बर्फ न मिलेगी । यदि मिले भी तो वह जम कर ऐसी कठोर हो गई होगी कि उसके ऊपर घोड़े पुख से चल सकेंगे । किन्तु इस रास्ते में बवैले जन्तुओं का भय अधिक है । मैंने उससे कहा-‘चौपाये जन्तुओं का उतना भय नहीं, जितना अधिक दुपाये नृशंस मनुष्यों का होता है ।” उसने कहा –'रास्ते में चोर-डाकुओं का भय नहीं है । भय केबल हिंत्र जन्तुओं का है। जहाँ तहाँ रास्ते में भेड़िये ज़रूर हैं । इस समय सारा जहूल और मैदान बर्फ से ढंक जाने के कारणखाद्यवस्तु के अभाव से, वे बड़े खार हो रहे हैं ” मैंने कहा,-वे भले ही रास्ते में रहें, हम लोग उनकी परवा नहीं करते । उनके शान्त करने के लिए हम लोगों के पास यथेष्ट अ-श हैं । १५ वीं नवम्बर को हम लोग उस व्यक्ति के प्रदर्शित पथ से रवाना हुए । रास्ते में बारह मनुष्य और मिले। उनमें कोई फ्रांसीसी था और कोई स्पेनिश । वे अपने नौकरों स्मृहित हम लोगों के दल में आ मिले । पथप्रदर्शक हम लोगों को घुमा ।