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राबिन्सन क्रूसो।

उत्तरार्ध

क्रूसो की मानसिक अशान्ति

बहुत लोग यह समझेगे कि मैं इतना बड़ा धनाढ्य होकर भ्रमण करना छोड़ एक जगह स्थिर होकर बैठ रहा हूँगा। किन्तु मेरे भाग्य में यह लिखा ही न था। घूमने का रोग मेरी नस नस में घुसा हुआ था। उस पर न मेरे बन्धु-बान्धव थे, न स्वजन-परिवार था और न घर-द्वार था, जिनके मोह से मैं देश छोड़ अन्यत्र नहीं जाता। संसार ही मेरा घर था; संसार के मनुष्य ही मेरे आत्मीय बन्धु थे। देश में आते ही फिर मुझे बेज़िल जाने की इच्छा होने लगी। एक बार फिर अपने उस टापू को देखने की इच्छा हुई। उस टापू में आने वाले स्पेनियर्ड लोगों का क्या हुआ, यह जानने के लिए मेरा चित्त बड़ा ही उत्सुक था। मेरे मित्र की पत्नी ने रोक रोक कर मुझे सात वर्ष देश में अटका रक्खा। इस अरसे में मैंने अपने दोनों भतीजों को कुछ लिखा-पढ़ाकर और कुछ रुपया-पैसा देकर मनुष्य बना दिया। उनकी हैसियत ऐसी हो गई जिससे वे अपना जीवन-निर्वाह अच्छी तरह कर सकते थे। मेरा एक भतीजा जहाज़ का कप्तान हुआ। वही छोकरा मुझे इस वृद्धावस्था में फिर विपत्ति के साथ युद्ध करने के लिए घर से खींचकर बाहर ले गया।

जब मैं लौटकर देश गया था तब मैंने ब्याह किया था। दो लड़के और एक लड़की होने के बाद मेरी स्त्री की मृत्यु हुई। उसी अवसर पर, १६९४ ईसवी को, मैं अपने भतीजे के जहाज़ पर सवार हो वाणिज्य करने की इच्छा से अमेरिका को रवाना हुआ।