पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२६३

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राबिन्सन क्रूसो ।

२४० राबिन्सन क्र। उत्तTध क्रसो की मानसिक अशान्ति बहुत लोग यह समझेंगे कि मैं इतना बड़ा धनाड्य होकर भ्रमण करना छोड़ एक जगह स्थिर होकर बैठ रहा हूँगा । किन्तु मेरे भाग्य में यह लिखा ही न था । घूमने का रोग मेरी नस नस में घुला हुआ था । उस पर न मेरे बन्धु-बान्धव थे, न स्वजनपरिवार था और न घरद्वार था, जिनके मेह से मैं देश छोड़ अन्यत्र नहीं जाता । संसार ही मेरा घर था; संसार के मनुष्य ही मेरे आत्मीय बन्धु थे । देश में आते ही फिर मुझे इंजिल जाने की इच्छा होने लगी। एक बार फिर आपने उस टापू को देखने की इच्छा हुई । उस टापू में आने वाले स्पेनियर्ड लोगों का क्या हुआ, यह जानने के लिए मेरा चित्त बड़ा ही उत्सुक था । मेरे मित्र की पत्नी ने रोक रोक कर मके सात वर्ष देश में अटका रक्खा । इस अरसे में मैंने अपने दोनों भतीजों के को कुछ लिखापढ़ाकर और कुछ रुपयापैसा देकर मनुष्य बना दिया। उनकी हैसियत ऐसी हो गई जिससे वे अपना जीवननिर्वाह अच्छी तरह कर सकते थे । मेरा एक भतीजा जहाज का कप्तान हुआ। वह छोकरा मुझे इस वृद्धा वस्था में फिर विपत्ति के साथ युद्ध करने के लिए घर से खींचकर बाहर ले गया। जब मैं लौटकर देश गया था तब मैंने ब्याह किया था । दो लड़के और एक लड़की होने के बाद मेरी स्त्री की वृत्यु हुई। उसी अवसर पर१६७४ ईसवी को, मैं अपने भतीजे के जहाज पर सवार हो वाणिज्य करने की इच्छा से अमेरिका को रवाना हुआ।