पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२६४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


! में क्रूसो की मानसिक अशान्ति। २४१ लोग कहा करते हैं,‘जाको है जौन सुभाव, सुनो वह कोटि उपाय किये न हिलै,’ ‘‘न घिसने से स्वभाव जाता है, और न धोने से कलक छूटता है ।’ यह कहावत मुझपर खूब घटती थी। पैंतीस वर्ष तक दारुण कष्ट भोगने के बाद सात वर्ष शान्ति से सुख भोग कर इस एकसठ साल के बुढ़ापे में देश-भ्रमण की इच्छा जाग उठने का कोई कारण न था, क्योंकि जो लोग देश घूमते हैं वे या तो द्रव्योपार्जन के लिए जाते हैं। या देश देखने के लिए । किन्तु मैंने देश घूम कर रुपया भी .खूब बटोरा और देश भी अनेक देखे । अतएव देशान्तर जाने की मुझे कोई आवश्यकता न थी । परन्तु यह बात मैं ऊपर कह आया हूँ कि ‘स्वभावो बलवतर: १, मेरा सैर करने का खभाव मुझको घर से बाहर होने के लिए दिन रात तकाज़ा करने लगा । इस विषय में मेरा जी इतना लगा रहता था कि स्वप्न में भी देशभ्रमण की ही बात देखता और बकता था। मेरे इस विषय की नित्य प्रति की एक ही बात लोगों को कर्ण कड हो उठी थी । यह मैं भली भाँति समझता था, किन्तु भ्रमण का उन्माद मेरे सिर पर सवार था । वह मुझे दूसरी ओोर हिलने डुलने न देता था । पथविहरण की लालसा लग रहे जिय सैं।दि । मनो पुकारत से हमें छिनए बिसरत लहि ॥ मैं किसी तरह उसके खिंचाव को रोक नहीं सकता था, किन्तु यह भी न जान सकता था कि मेरा झुकाव उस तरफ़ इतना क्यों है । चाहे जिस कारण से हो, मुझे घूमने का नशा था और उसने मुझको अपने अधीन बना रक्खा था । बुद्धिमान लोग कहा करते हैं कि असल में भूतप्रेत कुछ नहीं है, केवल मस्तिष्क की खराबी से लोगों के खयालात बदले जाते १६ !