पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२६८

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क्रता की मानसिक अशान्ति । २४५ रक्खे हुए रुपये काले पड़ गये थे, पर बीस वर्ष के दरमियान कभी उनका एक बार भी देखने की आवश्यकता न हुई थी। अब मैं कुछ कुछ समझने लग गया था कि मनुष्यजीवन का उदेश केवल आहारनिद्रा और विषयभोग ही नहीं है, प्रत्युत आत्मा की उन्नति ही उसका चरम उश है। उसी के सहायतार्थ देह रक्षा भी आवश्यक है । अर्थ की अपेक्षा धर्म ही मनुष्य के लिए आमूल्य सम्पत्ति है । किन्तु इस सम्पत्ति की रक्षा अब मुझसे कौन करावेगा ? मेरी प्रिय शिष्या और सचिव मुके अकेला छोड़ चली गई । मैं कर्णधारविहीन नौका की भाँति धनदौलतरूपी तूफ़ान में पड़ कर संसार में डूबता-उतराता हूँ । विदेश-भ्रमण की चिन्ता फिर मेरे शान्त निरापद भाव से- टह वास के सुख और खेतीबाड़ी के आनन्द को भुला करबड़ी निर्दयता के साथ मुझे बाहर की ओर खींचने लगी । बहरों के लिए संगीत की तरह, बिना जीभ वाले के लिए स्वादिष्ट खाद्य की तरह मेरे लिए मेरे घर का सुख नितान्त निरर्थक सा ऊँचने लगा। कई महीने बाद मैं अपना घर द्वार भाड़े पर दे कर लन्दन गया । लन्दन में भी मेरा जी न लगा । वहाँ भी त्ति को चैन न मिला । बिना कुछ रोज़गार के जीवन का बोझ लेकर घूमना कैसा कटदायक है, यह वही समझ सकेंगे जो चिरकाल से कर्मनिष्ठ हैं और जिनका जीवनसमय कभी व्यर्थ नहीं जाता । आलसी हेकर एक जगह बैठा रहना जीवन की हेयतम अवस्था है । वह जीवन के लिए एक बड़ी लाछना है । लन्दन में बैठकर आलसी की तरह जीवन बिताने की,अपेक्षा निर्जन द्वीप में रह कर जब मैं छब्बीस दिन में एक तख़्ता तैयार करता था मेरे लिए कहीं बढ़कर सुख का समय था री तब वह