पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२८५

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राबिन्सन क्रूसो

२६२ राबिन्सन ले । स्थयात्रा की तरह जलयात्रा नहीं होती कि काम पड़ने से एक जगह दसबीस दिन ठहर गये और काम हो जाने पर फिर आगे बढ़ने लगे। हम लोग इन सबों की सहायता करते थे परन्तु एक जगह स्थिर होकर रहने का सुभीता न था । बिना मस्तूल के जहाज़ को साथ ले चलने के कारण हम लोग पाल नहीं तान सकते थे । इससे हम लोगों का जहाज़ भी ठिकाने के साथ न चल कर उसी टूटे जहाज़ के साथ लड़खड़ाता हुआ चला । इस अरसे में उन लोगों के जहाज़ के मस्तूलों के काम चलाने योग्य ठीकठाक करके और जितनी हो सकी उतनी खाद्य-वस्तु दे कर उन्हें बिदा कर दिया । केवल वह यात्री युवक और उसकी दासी दोनों अपनी चीज़वस्तु लेकर हमारे जहाज़ पर चले आये। युवक की उम्र सत्रह वर्ष से अधिक न थी। वह सुन्दर, शिष्ट, शान्त और बुद्धिम मन् था । माता की मृत्यु से वह बेचारा एकदम सूख गया था । इसके कई महीने पूर्व उसके पिता का भी देहान्त हो गया था । वह अपने जहाज़ के लोगों पर बहुत ही रुष्ट था । वह कहा करता था कि उन लोगों ने मेरी माँ को भूखों मार डाला है। उन लोगों ने वास्तव में किया भी ऐसा ही था, पर उसके होश हवास में नहीं, उसकी निश्चेष्ट अवस्था में यह लीला हुई थी । वे लोग चाहते तो युवक की माँ के यकिश्चित् आहार दे कर उसके प्राणों को अब तक बचाये रह सकते थे। किन्तु लोगों के धर्मज्ञान और धैर्य को सुधा स्थिर रहने नहीं देती । लोगों का मन भूख से अत्यन्त चश्चल और दुर्दममीय हो उठता है । उस समय अपना पराया सब भूल जाता है, दया, धमें, और नोति-अनोति का ज्ञानएकदम लुप्त हो जाता है।