पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/२९२

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द्विप में पुनरागमन।

पहले उस स्पेनियर्ड के ऊपर पड़ी जिसको मैंने आासन्न- मृत्यु से बचाया था। उसको देखते हो मैंने पहचान लिया। मैंने कहा -"नाव से किसी के उतरने की ज़रूरत नहीं, मैं अकेला ही पहले जाऊँगा।" किन्तु फ्रा़इडे को रोक रखने की सामथ्र्य किस की थी। वह दूर ही से अपने बाप को देख कर व्यग्र हो उठा था। हम लोग उतनी दूर से कुछ भी न देख सके थे। यदि उसे मैं नाव से उतरने न देता तो वह पानी में ही कूद पड़ता। वह सूखे में पैर रखते ही तीर की तरह सन्न से अपने बाप के पास दौड़ गया। पिता को देख कर पहली बार उसके मन में जो आनन्द का उद्रेक होता था, वह देख कर आँसू रोक सके, ऐसा कठिन मनुष्य संसार में बिरला ही होगा। उसने बड़े ही विनीत-भाव से पिता को प्रणाम किया और बार बार उनके पैरों को चूमा। उसने बड़ी देर तक अपने पिता के मुँँह की ओर स्थिरदृष्टि से देखा । लोग जैसे बारीक नज़र से सुन्दर से सुन्दर चित्र को देखते हैं वैसे ही वह बड़ी स्नेह-दृष्टि से बार बार अपने पिता के देखने लगा मानो उसे अपने पिता को वारंबार देख कर भी तृप्ति न होती थी। इसके बाद उसने फिर पिता के पैर चूमे और उन्हें गले से लगाया। मारे उमङ्ग के वह कभी तो अपने पिता का हाथ पकड़ कर समुद्र के किनारे किनारे घूमता था और जिन नये देशों को देख आाया है उन देशों के कितने ही वृत्तान्त सुनाता था; और कभी दौड़ कर नाव से विविध खाद्य लाकर इन्हें खिलाता था। यदि ऐसी आपूर्व सुन्दर पितृभक्ति सभी को होती तो यह संसार स्वर्ग के सदृश पवित्र और अतिरम्य हो जाता ।