पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३५१

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३२६ राबिन्सन क्रसे। करता तो मेरी आज की तारीफ़ की जा सकती । यदि मैं वहीं रह कर द्वीप से देशान्तर को चावल भेजता और द्वीपनिवासियों के लिए आवश्यक वस्तुएं देश से मंग कर बनजब्यापार करता तो मैं अपनी बुद्धि का कुछ न कुछ परिचय देता। किन्तु मुझे तो भ्रमण का रोग दबाये बैठा था । मेरे सुख के पीछे शनिग्रह लगा फिरता था। द्वीपनिवासियों का अध्यक्ष होकर ही मैं अपने को धन्य मान बैठा था । आहकार में फूल कर उन लोगों पर हुकूमत करता था। किन्तु उन लोर्गों को किसी राजा के नाम से आबद्ध करने की बात कभी जी में न आती थी । यहाँ तक कि मैंने उस द्वीप का अब तक कुछ नाम भी न रक्खा था। वे लोग मुझको अपना सर मानते थे और मेरी आज्ञा के अनसार चलते थे किन्तु वह भी उनकी इच्छा पर निर्भर था। उन पर ज़ोर करने येाग्य मेरी क्षमता ही क्या थी ? कुछ दिन के बाद मुझे खबर मिली कि विल एटकिंस मर गया के पाँच स्पेनियर्ड रुष्ट होकर देश चले गये हैं और सभी लोग देश लौट जाने के हेतु व्यग्र है। रहे हैं । मैं कोरे का कोरा ही रह गया। भर पेट खाना और नींद भर सेना ही मेरा कर्तव्य रह गया । इससे संसार में किसका क्या उपकार हुआ है यह न समझिए कि मेरी मूर्खता का अन्त यहीं होगा, इसके अतिरिक्त में अपनी आज्ञता का अभी बहुत कुछ परिचय दूग । ईश्वर मेरी प्रार्थना को पूरी कर के दिखला देते थे कि तुम जो चाहते हो वह तुम्हारी भूल है, उससे तुम्हारा कोई कल्याण न होगा। में प्रार्थित फल पाकर भी पीछे से हाय हाय कर के मरता था। जिसे मैं । , सुख का कारण समझ कर चाहता था भगवान् वही मेरे हाथ दे, कर दिख़ला देते थे कि तेरे ज्ञान की दौड़ कहां तक है।