पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३५१

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राबिन्सन क्रूसो।


करता तो मेरी अक्ल की तारीफ़ की जा सकती। यदि मैं वहीं रह कर द्वीप से देशान्तर को चावल भेजता और द्वीपनिवासियों के लिए आवश्यक वस्तुएँ देश से मँगा कर बनजब्यापार करता तो मैं अपनी बुद्धि का कुछ न कुछ परिचय देता। किन्तु मुझे तो भ्रमण का रोग दबाये बैठा था। मेरे सुख के पीछे शनिग्रह लगा फिरता था। द्वीपनिवासियों का अध्यक्ष होकर ही मैं अपने को धन्य मान बैठा था। अहङ्कार में फूल कर उन लोगों पर हुकूमत करता था। किन्तु उन लोगों को किसी राजा के नाम से आबद्ध करने की बात कभी जी में न आती थी। यहाँ तक कि मैंने उस द्वीप का अब तक कुछ नाम भी न रक्खा था। वे लोग मुझको अपना सर्दार मानते थे और मेरी आज्ञा के अनुसार चलते थे किन्तु वह भी उनकी इच्छा पर निर्भर था। उन पर ज़ोर करने योग्य मेरी क्षमता ही क्या थी? कुछ दिन के बाद मुझे ख़बर मिली कि विल एटकिंस मर गया; पाँच स्पेनियर्ड रुष्ट होकर देश चले गये हैं और सभी लोग देश लौट जाने के हेतु व्यग्र हो रहे हैं। मैं कोरे का कोरा ही रह गया। भर पेट खाना और नींद भर सोना ही मेरा कर्तव्य रह गया। इससे संसार में किसका क्या उपकार हुआ? यह न समझिए कि मेरी मूर्खता का अन्त यहीं होगया; इसके अतिरिक्त मैं अपनी अज्ञता का अभी बहुत कुछ परिचय दूँगा। ईश्वर मेरी प्रार्थना को पूरी कर के दिखला देते थे कि तुम जो चाहते हो वह तुम्हारी भूल है, उससे तुम्हारा कोई कल्याण न होगा। मैं प्रार्थित फल पाकर भी पीछे से हाय हाय कर के मरता था। जिसे मैं सुख का कारण समझ कर चाहता था भगवान् वही मेरे हाथ देकर दिखला देते थे कि 'तेरे ज्ञान की दौड़ कहाँ तक है'