पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३६६

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मदागास्कार टापू में हत्याकाण्ड।


प्रभा स्पष्ट हो चुकी थी। मैं नाव के सहारे जहाज़ में जा बैठा और नाव को वापस कर दिया। यदि कोई वहाँ से लौट आवे तो उसे चढ़ाकर ले आवेगी।

धीरे धीरे आग बुझ गई। हल्ला भी कम हुआ। इससे जान पड़ा कि वे अत्याचारी अब लौटे श्रा रहे हैं। कुछ देर के बाद एक साथ कई बन्दूकों की आवाज़ सुन पड़ी। रास्ते में ग्रामवासियों के सोलह मनुष्यों को मारकर और कितने ही घरों को जलाकर कीर्तिमान् लोग लौट आये। वे दल बाँध कर नहीं पाते थे। सभी अलग अलग घूमते फिरते आ रहे थे। यदि कोई साहस करके उन पर आक्रमण करता था तो उसका प्राण बचना कठिन हो जाता था। समूचे देश में बड़ी सनसनी फैल गई। पाँच नाविकों को देखकर सौ द्वीपनिवासी जान लेकर भागते थे। अँधेरे में एकाएक आक्रान्त होने के कारण उनकी अक्ल यहाँ तक मारी गई थी कि उनमें किसी को हिम्मत न पड़तो थी कि कोई उन दुराचारियों के दुष्कर्म में बाधा डाले। इससे हमारे नृशंस नाविकों को ज़रा भी चोट न आई; सिर्फ एक आदमी का पैर मोच खा गया था, और एक आदमी का हाथ जल गया था।

मैं सभी के ऊपर अत्यन्त रुष्ट था, विशेष कर अपने भतीजे के ऊपर। वह कैसा निर्बुद्धि था, वह जहाज़ का कप्तान होकर ऐसे बुरे कामों में फँस पड़ा! जहाज़ का भला-बुरा सब उसी के ऊपर निर्भर था। उसने अपने अधीन कर्मचारियों को विपत्तिजनक नीचकर्म से निवृत्त न करके उन्हें और उत्तेजित किया। मेरी झिंड़कियाँ खाकर मेरे भतीजे ने बड़ी मुलायमियत के साथ मुझे उत्तर दिया-"हाँ, अन्याय मुझ से बेशक हुआ