पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३६६

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मागास्कर टापू में हत्याकाण्ड । ३४१ प्रभा स्पष्ट हो चुकी थी । मैं नाव के सहारे जहाज़ में जा बैठा और नाव को वापस कर दिया । यदि कोई वहाँ से लौट आ तो उसे चढ़ाकर ले आवेगी। से धीरे धीरे आग बुझ गई। हल्ला भी कम हुआ । इससे जान पड़ा कि वे अत्याचारी अब लौटे आ रहे हैं । कुछ देर के बाद एक साथ कई बन्दूकों की आवाज़ सुन पड़ी । रास्ते में ग्रामवासियों के लह मनुष्यों को मारकर और कितने ही घरों को जलाकर कीर्तिमान लोग लौट आये। वे दल बाँध कर नहीं आते थे । सभी अलग अलग घूमते फिरते आ रहे थे। यदि कोई साहस करके उन पर आक्रमण करता था तो । उसका प्राण बचना कठिन हो जाता था । समूचे देश में बड़ी सनसनी फैल गई । पाँच नाविकों को देख कर सौ द्वीपनिवासी जान लेकर भागते थे। अँधेरे में एकाएक आक्रान्त होने के कारण उनकी आक्ल यहाँ तक मारी गई थी कि उनमें किसी को हिम्मत न पड़तो थी कि कोई उन दुराचारियों के दुष्कर्म में हैं। बाधा डाले । इससे हमारे नृशंस नाविकों को ज़रा भी चोट न आईसिर्फ एक आदमी का पैर मेच खा गया था, और एक आदमी का हाथ जल गया था । मैं सभी के ऊपर अत्यन्त रुष्ट था, विशेष कर अपने भतीजे के ऊपर । वह कैसा निकृद्धि था, वह जहाज़ का कप्तान होकर ऐसे बुरे कामों में धंस पड़ा ! जहाज़ का भलाबुरा सब उसी के ऊपर निर्भर था । उसने अपने अधीन कर्मचारियों को विपत्तिजनक नीचकर्म से निवृत्त न करके उन्हें और उत्तेजित है। • किया । मेरी भिंड़कियाँ खाकर मेरे भतीजे मैं बड़ी मुलायमियत के साथ मुझे उत्तर दिया–‘हाँ, अन्याय मुझ से बेशक हुआ ’ ) ।