पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३६८

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भारत में क्रसे का निर्वासन। ३४३ उलटा ही हुआ । ‘उपदेशो हि मूखणां प्रकोपाप न शान्तये । पयःपान भुजज्ञान केवल विषवर्धन।'जो माँझी उस अत्या चार का अगुआ था वह एक दिन बड़े निर्धक भाव से मेरे पास आकर मेरी ओर लक्ष्य कर के बोला—तुम कौन होते हो जो रातदिन इस बात को लेकर उपदेश की झड़ी लगाये रहते हो, और हम लोगों को झिड़कियाँ बताते हो ? तुम तो 1 इस जहाज़ के मामूली यात्री हो। हम लोगों पर तुम इतनी हुकूमत क्यों करते हो ? मैं देखता हूं, तुम हम लोगों को फंसाने . . की चेष्टा कर रहे हो । ढंगलैंड जाकर हम लोगों को तुम क़ानून के के जुर्म में फंसा कर, मालूम होता है, भारी फ़साद उठायोगे। इसलिए अभी कह देता हूं के यदि तुम मौन साध कर भले आदमी की तरह न रहोगे तो तुम्हारे हक में अच्छा न होगा । । मैंने धीरतापूर्वक उसकी सब बातें चुपचाप सुन लीं। इसके बाद मैंने गम्भीरतापूर्वक कहा-तुम लोगों के व्यवहार से मेरे चित्त को सन्तोष नहीं होता। इससे मैं बराबर हैं तुम्हारे इस काम में बाधा डालता आता हूं। इतना कहने का अधिकार प्रायः सब केा है। इसे तुम प्रभुता समझो या जो । तुम्हारे जी में आवे से समझो ' यह कहते कहते ज़रा में भी जद्ध हैहैो उठा। माँझी इस पर कुछ न बोला। मैंने समझा, विवाद यहीं तक रहा। इतने में हम लोग कारोमण्डल उपकूल से हो कर भारत में पहुँच गये । वह देश देखने के लिए मैं किनारे उतर पड़ा । सन्ध्या समय जहाज़ पर लट जाने का उद्योग कर रहा था कि त्रेहाज़ से एक आदमी ने आकर मुझसे कहा, ‘आप नाव पर चढ़ने का कष्ट न उठाव । आपको जहाज़ ' ।