पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३६९

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३४४ राबिन्सन क्रस । १ पर जाने की मनाही है ।’ इस अतजित संवाद से जो मेरे मन में क्षोभ और आश्चर्य हुआ, बहू कहने का नहीं । मैंने पूछा-“तुमसे यह किसने कहा है’ ? उस नाविक ने कहा माँझी ने । मैंने उससे और कुछ न पूछ कर जहाज़ के भण्डारी को जहाज़ पर भेज कर अपने भतीजे के यह खबर दी। किन्तु यह ख़बर न देने से भी काम चल जाता। मेरे भतीजे को यह हाल पहले ही मालूम हो चुका था। जहाज़ से उतर कर मैं ज्योंही स्थल में आया त्योंही माँझी प्रति प्रधान नाविकों ने कप्तान के पास जाकर मर ऊपर नालिश की और कहा, हम लोग उस आदमी के साथ कभी एक जहाज़ पर न रहेंगे। अच्छा हुआ कि वह इस जहाज़ पर से आप ही उतर गया नहीं तो हम लोग उसे बर्दस्ती इस जहाज़ पर से उतार देते । यदि आप उसका पक्ष ले कर हम लोगों की प्रार्थना पर ध्यान न देंगे तो हम लोग सबके सब जहाज़ छोड़ कर चले जाऊँगे। माँझी का इशारा पा कर सभी नाविक एक स्वर से बोल उठे हाँ, माँझी का कहना सही है । जहाज़ का कतान ( मेरा भतीजा ) बड़ा ही समझदार और दीर्घx था। उसने इस उत्कट प्रस्ताव से क्षुब्ध होने पर भी गम्भीर-भाष धारण कर के उन लोगों से कहा “इसका जवाब मैं सोच कर अँगा । जब तक उनसे इस विषय में सलाह न कर लेंगा तब तक तुम लोगों से कुछ न कह सऊंगा ।’ उसने उन लोगों के इस प्रस्ताव की अयुक्तता दिखेलाने की कुछ चेष्टा की किन्तु नाविकई ने कान के मृह के सामने ही प्रतिज्ञा कर के स्पष्ट रूप से कह दिया कि 0