पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३७०

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भारत में क्रूसो का निर्वासन।


यदि कप्तान हम लोगों की बात न मानेंगे तो हम लोग जहाज़ से उतर कर चले जायँगे।

मेरा भतीजा बड़े संकट में पड़ा। नाविकों की बात मानता तो मुझसे उसे नाता तोड़ना पड़ता है और यदि मेरा पक्ष लेता है तो वे लोग बिगड़ कर चले जायँगे। नाविक न रहने से जहाज़ कैले चलेगा? किन्तु उन लोगों के कारण वह मुझको कैसे छोड़ दे, इस चिन्ता ने उसके चित्त को मथ डाला। तब उसने कुछ बात बनाकर उन लोगों से कहा-"मेरे चचा साहब इस जहाज़ के हिस्सेदार हैं, इसलिए उनको अपनी निज की सम्पत्ति से दूर करने वाला मैं कौन हूँ? तुम लोग रहना न चाहो तो जहाज़ छोड़ कर चले जाओ। किन्तु इस बात को भली भाँति याद रक्खो कि देश लौटने पर तुम लोग सहज ही न छुट सकोगे। बेहतर होगा कि माँझी मेरे साथ चले। इस विषय में सब आदमी मिल कर जो राय तय करेंगे वही होगा।" माँझी ने कहा-"उसके साथ हम लोगों का कोई सम्पर्क नहीं है। वह यदि जहाज़ पर आवेगा तो हम लोग उतर जायँगे।" तब कप्तान ने उन सबोंसे कहा-अच्छा, तो मैं ही जा कर उनको ख़बर देता हूँ।

जब मैंने भण्डारी को उसके पास भेजा उसके कुछ ही देर बाद मेरा भतीजा मेरे पास आ पहुँचा। उसे देख कर मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मुझे इस बात का भय था कि शायद नाविकगण उसे मुझसे भेट न करने दें। इस दूर देश में मुझे खजन-हीन निःसहाय अवस्था में छोड़ जाने से मैं निःसन्देह बड़ी विपत्ति में पड़ जाता। मैं उस निर्जन द्वीप में जैसा पहले पहल जा पड़ा था, उसकी अपेक्षा भी यहाँ की अवस्था शोच-