पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३७३

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राबिन्सन क्रूसो।

३४८ राबिन्सन से । • एक मिस्त्री और तीन नाविक भी मिल गये। बाकी भारतीय नाविक नियुक्त कर लिये गये। हम लोग सुमात्रा टापू की सरहद से होते हुए स्याम देश में पहुँचे। वहाँ हम लोगों ने वस्तुएं बेच कर अफ़ीम और कुछ आ रीदे । उस समय चीन देश में अफ़ीम की बड़ी खपत थी। आठ महीने वाणिज्य करने के बाद हम फिर भारत को लौट आये । इन देशों में तिजारत कर के द्रव्योपार्जन की सुविधा और विलक्षण लाभ देख कर मेरा जी बहुत खुश हुआ । मेरी उम्र यदि एक चौथाई अर्थात् १५२० वर्ष और कम होती तो मैं इस देश को छोड़ कर च्य खोजने के लिए अन्यत्र कहीं न जाता । किन्तु मेरे ऐसे साठ वर्ष के युडू और प्रचुर धनशाली व्यक्ति को केवल ल भ के सम्बन्ध से इन देशों पर विशेष मोह न था। क्योंकि मैं तो रुपया कमाने के लिए आया नहीं था । देश देखने ही के लिए मेरा आाना हुआ था। से इन नये देशों के दर्शन हो गये । अब देश लौटने के लिए जी अकुलाने लगा। देश म रहने से बाहर जाने के के लिए चित्त व्यग्र होता था और बाहर आने पर देश जाने के लिए जी में छटपटी लगी रहती थी। मेरे साथी अँगरेज़ पूरे व्यवसायी थे । ये अपने व्यवसाय के पीछे दिनरात हैरान और परेशान रहते थे। जिधर कुछ अधिक लाभ देखते उधर ही दौड़ पड़ते थे । मेरा खयाल केवल घूमनेफिरने की ओर था। एक स्थान को दोबारा देखना मेरी आँखों में खटकता था। मेरे साझी ने मुझसे यह प्रस्ताव किया कि अब की बार मसाला टापू में जाकर एक जहाज़ भर लोग लाकर व्यवसाय किया जाय । यद्यपि वाणिज्यव्यवसाय में मेरा पूर्ण उत्साह नहीं था तथापि T - “वैये से बेगार भली’ की कहावत चरितार्थ करना उचित