पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३८८

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क्रूसो का छुटकारा। ३६२ । आ फ़त लगी ही रहेगी। क्योंकि सभी इस जहाज़ पर नाराज़ हैं। वह मनुष्य भीतर से कितना ही निषिी और सज्जन क्यों न होगा पर पोर्टेगीज़ों और अँगरेजों के जहाज़ से उसकी 1 रक्षा न होगी । वृद्ध ने कहा-में उसका भी प्रबन्ध कर गई। बहुत कतानों के साथ मेरा परिचय है। वे लोग जब इस रास्ते से जायग तब मैं उन सबों से सेट करके सब वृत्तान्त समझा कर कह ढूंगा । हम लोगों ने नानकुईनउपसागर के प्रान्तीय क्षुख्याँग बन्दर में जाकर जहाज़ लगाया। आफ़त की जड़ जहाज़ से उतर कर धरती में पाँव रखते ही हम लोगों की जान में जान आई । यदि जहाज़ मिट्टी मोल भी बिक जायगा तो हम लोग एक बार सिर न हिलायेंगे। रातदिन भयभीत बना रहना कैसी विडम्बना है ! आँखों में नींद नहीं, चित्त में चैन नहीं, खानेपीने की इच्छा नहीं । केवल मृत्यु और कल से की विभीषिका को सामने रख कर समय बिताना बड़ा कटकर है । मैं इस बुढ़ापे में चोरी की इल्लत में पकड़ा जाकर विदेश में में फाँसी से प्राण गवाँने बैठा था । किन्तु मैं किसी मति यह अपमानजनक मृत्यु सह्य नहीं कर सकता। मैं शत्रुओं के साथ प्राणपण से युद्ध करता । यदि युद्ध में जीत न सकता तो जहाज़ को बारूद से उड़ा देता । किसी को विजय-जनित अहकार करने का अवकाश न देता । जब मैं इन बातों को सोचता था तब मेरा दिमाग गरम हो उठता था । एक दिन ऊँघते ऊँघते मैंने जहाज़ के तख़्ते पर ऐसे ज़ोर से धंसा मारा कि हाथ में चोट लगने से लहू बह निकला ।