पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/३९०

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३६५ चोरी के जहाज की सद्गति । अच्छा यही सही, मैं देशभ्रमण कर पाऊँ तो फिर मुके क्या चाहिए । एक बार जापान देश भी तो देख था। किन्तु मेरे साझेदार मुझसे अधिक बुद्धि मान् थे। वे मुझको इस बद कार जहाज पर किसी तरह भी जाने देना नहीं चाहते थे। में सोच ही रहा था, कि अब क्या करना चाहिए इतने में वही नवयुवक मुंशी, जिसे मेरा भतोजा मेरे पास छोड़ गया था, मेरे पास आकर कहने लगा, -महाशययदि आप मुझ पर विश्वास करके यह जहाज मेरे जिम्मे कर दें तो मैं एक बार वाणिज्य करके देहूं । यदि मैं जीते जी गलैण्ड लौटेंगा तो आपका जो कुछ मेरे जिम्मे पावना निकलेगा वह आपको देकर हिसाब समझा गूंगा। मैंने अपने साझी अँगरेज़ से इस विषय में परामर्श किया। उन्होंने कहा-जहाज़ बड़ा अभागा है । उस पर अब हमें और आपको पैर रखना लाज़िम नहीं। आपका मुंशी यदि इस जहाज़ को लेकर कुछ व्यवसाय करना चाहता है तो भले ही करे । उसमें हम लोगों की हानि ही क्या है ? हम लोग जब राम राम करके कुशलपूर्वक ढंगलैंड पहुंच जायेंगे और वह 1 भी यदि नफ़ा उठा कर वहाँ लौट आवेगा तब उस लाभ का आधा उसका होगा और आधा हमारा और आपका। इस शर्त पर उसके साथ लिखापढ़ी हो गई। वह जहाज़ लेकर जापान गया : जापानी सौदागर ने उसे भाड़ा चुकाकर फ़िलिपाइन और मैनिला आदि टापुओं में बनज करने भेजा । वह जापान का माल टापुओं में ले जाकर बेचता . और टापुओं से मसाला लाकर जापान में बेचता था। ईस प्रकार ख़रीदफ़रो करके मैनिला से उसने