पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/४०६

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क्रूसो का स्थलमार्ग से स्वदेश को लौटना ।

' क्रूसो का स्थलमार्ग से स्वदेश के लौटना । ३७8 , इसी शीतप्रधान दारुण देश में रूस के कैदी निर्वासित ° किये जाते हैं । यहाँ रूसी सरकार के रोष से दण्डित तथा निर्वासित कितने ही भद्र नरनारियों को हम लोगों ने देखा। बहुतों के साथ बात चीत की। उनमें प्रायः सभी बड़े शिक्षित और धार्मिक थे। वे लोग और कुछ अपराध तो नहींकेवल सच्ची भक्ति और श्रद्धा से देशसेवा करते हैं। ऐसा कर पा राजाज्ञा के विरुद्ध आचरण हुआ । इसी कारण वे लोग दण्डित हुए हैं । एक युचक ने अपने धर्मशान के द्वारा मुझे दू व ही मुग्ध किया था । उनका सिद्धान्त यही था कि‘‘अपने औत्मा को जीतना ही वास्तविक महत्व है। राजप्रासाद की अपेक्षा यह निर्वासन मेरे लिए कहीं बढ़कर सुखद है। इन्द्रिय और चित्तवृत्ति को रोक कर सब अवस्थाओं में प्रसन्न रहना ही मनुष्यशान की चरम सार्थकता है। बाहरी यन्त्रणाओं को सह करके मन की शान्ति और सन्तोष को आध्याहत रखना ही धीरता है ।२२ जब वे पहले निर्वासित हुए थे तब निष्फल हैं क्रोध और अकारण क्षोभ से अपने हाथ से अपने सिर के बाल नोचते थे । किन्तु कुछ ही दिन के सोचविचार और a घचिन्ता से वे समझ गये कि संसार में सुखदुःख केवल मन की अवस्था है । ‘मन एव मनुष्याण कारण बन्ध मोक्ष' 13’ चित की गति स्थिर हो तो सभी अवस्थाओं में . सुख है । चित्तवृत्ति के निरोध हो का नाम योग है । यथार्थ में दुःख कुछ हई नहीं । संसार में यदि दुःख कुछ है ते आज्ञानता मात्र हैं जिस में जितना ही अज्ञानता का भाग अधिक है वह उतना ही अधिक दुखी रहता है । शान का उदय ' होते ही दुःख का फिर कहीं नामनिशान •नहीं रहता'। अहकार, लोभ और इन्द्रियवशता त्याग देने