पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/४०६

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क्रूसो का स्थलमार्ग से स्वदेश को लौटना।

इसी शीतप्रधान दारुण देश में रूस के क़ैदी निर्वासित किये जाते हैं। यहाँ रूसी सरकार के रोष से दण्डित तथा निर्वासित कितने ही भद्र नर-नारियों को हम लोगों ने देखा। बहुतों के साथ बात चीत की। उनमें प्रायः सभी बड़े शिक्षित और धार्मिक थे। वे लोग और कुछ अपराध तो नहीं, केवल सच्ची भक्ति और श्रद्धा से देशसेवा करते हैं। ऐसा करना राजाज्ञा के विरुद्ध आचरण हुआ। इसी कारण वे लोग दण्डित हुए हैं। एक युवक ने अपने धर्मज्ञान के द्वारा मुझे ख़ूब ही मुग्ध किया था। उनका सिद्धान्त यही था कि "अपने आत्मा को जीतना ही वास्तविक महत्व है। राजप्रासाद की अपेक्षा यह निर्वासन मेरे लिए कहीं बढ़कर सुखद है। इन्द्रिय और चित्तवृत्ति को रोक कर सब अवस्थाओं में प्रसन्न रहना ही मनुष्यज्ञान की चरम सार्थकता है। बाहरी यन्त्रणाओं को सह करके मन की शान्ति और सन्तोष को अव्याहत रखना ही धीरता है।" जब वे पहले निर्वासित हुए थे तब निष्फल क्रोध और अकारण क्षोभ से अपने हाथ से अपने सिर के बाल नोचते थे। किन्तु कुछ ही दिन के सोच-विचार और तत्त्व-चिन्ता से वे समझ गये कि संसार में सुख-दुःख केवल मन की अवस्था है। "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।" चित्त की गति स्थिर हो तो सभी अवस्थाओं में सुख है। चित्तवृत्ति के निरोध ही का नाम योग है। यथार्थ में दुःख कुछ हई नहीं। संसार में यदि दुःख कुछ है तो अज्ञानता मात्र; जिसमें जितना ही अज्ञानता का भाग अधिक है वह उतना ही अधिक दुखी रहता है। ज्ञान का उदय होते ही दुःख का फिर कहीं नाम-निशान नहीं रहता। अहङ्कार, लोभ और इन्द्रियवशता त्याग देने