पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/४०८

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क्रुसो का स्थलमार्ग से स्वदेश को लौटना।

एक जगह स्थिर होकर रहने ही में सुख है। हाँ, यदि आप अनु- ग्रह करना चाहते हैं तो मेरे पुत्र को इस देश से मुक्त कर दें। यह मुझ पर ही एहसान होगा। इससे मैं विशेष उपकृत हूँगा।

जून का आरम्भ होते ही मैं रवाना हुआ। मेरे साथ कुल ब तीस ऊँँट-घोड़े थे। और सब साथी, जो जहाँ के थे, क्रम क्रेम से चले गये। उतने बड़े दल में एक मैं ही यात्री बच रहा था। छद्म- वेशी रूसी सज्जन और उनका नौकर हमारे नये साथी हुए। हम लोग रेगिस्तान पार हुए। तदनन्तर हम प्रधान-पथ छोड़ कर टेढ़े मेढ़े रास्ते से चलने लगे। किसी शहर में जाते भी न थे। क्या जाने, मेरे साथी छद्मवेशी भद्र महाशय को कोई पहचान ले ।

क्रमानुगत हम लोगों ने यूरोप देश में प्रवेश किया। एक जगल के भीतर होकर जाते समय हम लोगों का जीवनधन सब लुटेरों के हाथ जाते जाते बचा। ये लोग भी तातारी घुड़सवार लुटेरे थे । गिनती में पच्चीस से कम न थे। वे हम लोगों पर हैं, आक्रमण करने की बात में लगे । किन्तु वे लोग जिस तरफ़ ? जाते थे उसी तरफ़ हम लोग भी जाते थे । इस तरह हम लोगों ने बड़ी देर तक उन्हें घुमाफिरा कर हैरान किया। रात होने पर वे लोग चले गये । हम लोगों ने भी एक झाड़ी की आड़ में जाकर आश्रय लिया ।

कुछ ही देर बाद हम ने देखा कि करीब अस्सी डाकू हम लोगों का मालअसबाब लूटने के लिए चले आ रहे हैं। निकट आते ही उनको हम लोगों ने गोली मारी। उससे बहुत लोग मरे और घायल हुए। और लोग डर कर वहाँ से टूर.’ भाग गये । हम लोग उनके कई घोड़े पकड़ लाने।