पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/५०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
४१
क्रूसो का जहाज़ डूबा ।


आधी सम्पत्ति का मूल्य इँगलेण्ड में मेरे पिता के पास पहुँचा दें ।

क्रूसो का जहाज़ डूबा।

मैंने अपनी सम्पत्ति-रक्षा के लिए जितनी सावधानी और भविष्य-चिन्ता की थी, उसकी आधी भी यदि मेरे निज के लिए स्वार्थ बुद्धि होती तो मैं उत्तरोतर बढ़ती हुई निरापद आर्थिक अवस्था को छोड़ कर समुद्रयात्रा के प्रस्ताव पर कभी सम्मत न होता । एक तो समुद्रयात्रा स्वभावतः विघ्नों से युक्त होती है, उस पर मेरे ऐसे हतभाग्यों का तो का तो कुछ कहना ही नहीं । विपत्ति पर विपत्ति को आशंंका बनी ही रहती थी । बुद्धि की अवहेला करके इच्छा के अधीन होजाना मेरा स्वभाव था । इच्छा मुझे ज्ञानान्ध बनाकर बलात् खींच ले चली ।

जहाज़ जाने के प्रस्तुत हुआ । सीपों के हार, आइना, छुरी , कैंची, कुल्हाड़ी, और खिलौना आदि कम कीमती चीजें जहाज़ पर लादी गईं । मैं १६५९ ईसवी की पहली सितम्बर के अशुभ मुहूर्त में जहाज़ पर सवार हुआ । आठ वर्ष पूर्व इसी तारीख को मैने, मूर्ख की तरह माँ-बाप के आदेश का तिरस्कार करके पहले पहल समुद्र यात्रा की थी ।

जहाज़ पर छः तोपें चौदह नाविक, एक कप्तान, उनका नौकर और मैं था । हम लोग जिस दिन जहाज़ पर चढ़े उसी दिन जहाज़ रवाना हुआ । समुद्र का जल स्थिर था, और वायु भी अनुकूल थी । हम लोग अफ्रीका जाने के विचार से उत्तर और चल पड़े । बारह दिन बाद, हम लोगों को ज्ञात होने के पहले ही, एकाएक भयंकर तूफान उठा ।