नाना कर्म धर्म ब्रत दाना । सञ्जम दम जप सप मख नाना ॥
भूतदया द्विज गुरु सेवकाई ! विद्या विनय पिक बड़ाई ॥३॥
नाना प्रकार के शुभकर्म, धर्म, व्रत, दान, संयम, इन्द्रियदमन, जप तप अनेक तरह के यज्ञ, जावो पर दया, ब्राह्मण तथा गुरु की सेवकाई, विद्या, नम्रता और शान की बड़ाई ॥३॥
जहँ लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरिभगति भवानी ॥
सो रघुनाथभगति सुति गाई । राम कृपा काहू एक पाई ॥४॥
जहाँ तक साधन वेदेो ने कहा है, हे भवानी ! उन सब का फल हरिभकि है । वह रघु- नाथजी की भक्ति जिसकी प्रशंसा श्रुतियों ने की है, रामचन्द्रजी की कृपा से उसको काई एक (करोड़ों प्राणियों के बीच में) पाते हैं ॥४॥
दो०-मुनि दुर्लभ हरिभगति नर, पावहिँ बिनहिं प्रयास ।
जे यह कथा निरन्तर, सुनहिँ मानि विस्वास ॥१६॥
मुनियों को दुर्लभ हरिभकि मनुष्य विना परिश्रम पावे हैं जो विश्वास मान कर सदा इस कथा को सुनते हैं ।।१२६॥
चौ०-साइ सर्वज्ञ गुनी सोइ ज्ञाता । सोइ महिमंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता ॥१॥
वही सब जाननेवाला गुणी, वही ज्ञानवान, वही पृथ्वी को शामित करनेवाला, परिंडत और दानी है । वही धर्म में तत्पर और कुल का रक्षक है जिसका मन रामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक है ॥२॥
समो की प्रति में सोइ.सर्वज्ञ सोई गुन शाता' पाठ है ।
नीति निपुन खोइ परम सयाना। खुति सिद्धान्न नीक तेहि जाना ॥
सो कबि कोबिद सो रनधीग । जो छल छाडि भजइ रघुवीरा ॥२॥
वेद का सिद्धान्त है कि उसी को नीति में प्रवीण, उसी को अत्यन्त चतुर ओर अच्छा जानना चाहिये। वही कवि, विद्वान और वही रणधोर है जो छल छोड़ कर रघुनाथजी को भजता है॥२॥
धन्य देस सो जहँ सुरसरी । धन्य नारि पतिव्रत अनुसरी॥
धन्य सा भूप नीलि जो करई । धन्य सो द्विज निजधर्म न टरई ॥३॥
वह देश धन्य है जहाँ गडाजी हैं और वह स्त्री धन्य है जो पतिव्रत-धर्म के अनुसार चलती है। वह राजा धन्य है जो नीति से प्रजापालन करता हो और वह ब्राह्मण धन्य है जिसका ब्राह्मण धर्म न टलता हो ॥३॥
सभा की प्रति में 'धन्य सुदेस जहाँ सुरसरी' पाई है।