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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/२४३

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रामचरित-मानस।

चौ॰—जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहिँ लागि धरिहउँ नर-बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेइहउँ दिनकर-बंस उदारा ॥१॥

हे मुनि, सिद्ध और इन्द्र! मत डरो, तुम्हारे लिए मैं मनुष्य का शरीर धारण करूंगा। अपने अंशों समेत श्रेष्ठ सूर्यकुल में मनुष्य जन्म लेऊँगा ॥१॥

कस्यप अदिति महा तप कीन्हा। तिन्ह कहँ मैँ पूरब बर दीन्हा॥
ते दसरथ-काैसल्या—रूपा। कोसलपुरी प्रगट नर-भूपा ॥२॥

कश्यप और अदिति ने बड़ी तपस्था की है, उनको मैं ने पहले वर दिया है। वे अयोध्यापुरी में दशरथ और कौशल्या रूप नरराज प्रकट हुए हैं ॥२॥

तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सुचारिउ भाई॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ ॥३॥

उन सुन्दर रघुफुल-तिलक (दशरथजी) के घर जा कर हम चारों भाई अवतरेंगे। परम-शक्ति (सीताजी) के सहित जन्म ले कर नारदजी की सब बातें सच्ची करेंगे ॥३॥

शङ्का—पूर्व में मनु-शतरूपा की तपस्या कह कर जिस कल्प में भानुप्रताप रावण हुआ, उस कथा को विस्तार से वर्णन करने का सङ्कल्प प्रकट किया गया है, किन्तु यहाँ आकाशवाणी द्वारा कश्यप-अदिति की तपस्या और नारदमुनि के शाप को सत्य करना कहलाया। इसका क्या कारण है?

उत्तर—गोस्वामीजी ने रामचरितमानस में परब्रह्म के अवतार की कथा जिसमें भानुप्रताप रावण हुआ उसको प्रधान रूप से वर्णन किया है और गौण रूप से बीच बीच में अन्य तीनों अवतारों की कथा भी कहते गये हैं। जैसे-रमानाथ जहँ राजा, पय-पयोधि तजि अवध बिहाई, मोर साप करि अङ्गीकारा, इत्यादि असंख्यों प्रमाण भरे हैं। आकाशवाणी में सूक्ष्म रीति से चारों अवतारों का विवरण है। 'जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा, इत्यादि' उस कल्प की आकाशवाणी है जिस कल्प में साकेत बिहारी परब्रह्म अवतरे, मनु-शतरूपा ने तप किया और भानुप्रताप रावण हुआ। शेप कश्यप-अदिति के तप की बात जिस कल्प में विष्णु भगवान् ने अवतार लिया, नारदजी ने शाप दिया, जय-विजय, जलन्धर, शिव-गण रावण हुए उस कल्प की वाणी है।

हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥
गगन ब्रह्म-बानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना ॥४॥

हे देवतावृन्द! निडर हो जाओ, मैं समस्त पृथ्वी के वोझ को हर लूँगा। इस तरह कान से आकाश की ब्रह्मवाणी सुन कर देवताओं का हृदय शीतल हुआ, वे तुरन्त वहाँ से लोटे ॥४॥

तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय अई मरोस जिय आवा ॥५॥

तब ब्रह्माजी ने पृथ्वी को समझाया, वह निर्भय हुई, जी में भरोसा पाया ॥५॥