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पृष्ठ:रामचरितमानस.pdf/६२६

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द्वितीय सोपान, अयोध्याकाण्ड।


और विधि की करनी पर ढार कर उन्हेॅ समझाने लगे। यह कल्पित प्रश्न का 'गूढ़ोत्तर अल- कार' है।

दो-तुम्ह गलानि जिय जनि करहु, समुझि मातु करतूति ।
तात कैकइहि दोष नहि, गई गिरा मति धूति ॥२०६॥

माता की करनी को समझ कर आप मन मेॅ ग्लानि मत करो। हे तात! केकयी का दोष नहीॅ, उसकी बुद्धि सरस्वती द्वारा ठगी गई ॥२०६॥

केकयी के दोष का निषेध मुनिजी इसलिये करते हैॅ कि उसका धर्म सरस्वती मेॅ आरोपित करना अभीष्ट है, उसी ने केकयो को मति को ठग लिया 'पर्यास्तापहृति अलंकार' है

चौ०-यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोक-बेद बुध सम्मत दोऊ ।
तात तुम्हार बिमल-जस गाई । पाइहि लोकहु-बेद बड़ाई ॥१॥

यह कहने मेॅ भी कोई अच्छा न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनोॅ की बातेॅ पंडितों को मान्य होती हैॅ । हे तात ! आप का निर्मल यश गान करके लोक और वेद बड़ाई पावेगे ॥१॥

लोक बेद सम्मत सब कहई । जेहि पितु देइ राज सो लहई ।
राउ सत्य-व्रत तुम्हहिँ बोलाई । देत राज-सुख धरम बड़ाई ॥२॥

लोक भार वेद की सम्मति को सब कहते हैं कि जिसको पिता दे वही राज्य पाता है। राजा सत्यव्रती थे, (जो कर दिया उसके अनुसार) तुम्हे बुला कर राज्य मुख देते थे,वह उनके धर्म की प्रशंसा है ॥

राम-गंवन-बन अनरथ-मूला । जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ।
सो भावी-बस. रानि अयानी । करि कुचाल अन्तहु पछित्तानो ॥३॥

रामचन्द्रजी का वन-गमन अनर्थ का मूल हुआ जो सुन कर सारे संसार को पीड़ा हुई। वह होनहार के वश रानी केकयी ने मूर्खता की, कुचाल करके अन्त को पछताई ॥३॥

तहउँ तुम्हार अलप अपराधू । कहइ से अधम अयान असाधू ॥
करतेहु राज त तुम्हहिँ न दोसू । रामहिॅ होत सुनत सन्तोसू ॥४॥

वहाँ भी जो तुम्हारा थोड़ा अपराध कहे, वह नीच, मूर्ख और दुष्ट है । यदि राज्य करते तो तुम्हेॅ दोष नहीॅ था और यह सुन कर रामचन्द्रजी को संतोष होता।।४।।

दो-अब अति कीन्हेहु मरत भल, तुम्हहिॅ उचित मत एहु ।
सकल सुमङ्गल-मूल जग, रघुबर चरन सनेहु ॥ २०७॥

हे भरत ! अब आपने बहुत अच्छा किया, आपको यही मत उचित है। रघुनाथजी के चरणोॅ का स्नेह संसार में सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोॅ का मूल है ॥२०७॥