पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१०६

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१०९ विनय-पत्रिका खरूप और मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं। आप पूर्ण आनन्दवरूप, अचल, सीमारहित, मोक्षरूप, उपाधिरहित, ममतारहित और सबके विधाता हैं ॥ ५॥ आप बडे-बड़े मङ्गलोंके मूल, आनन्द और महिमाके स्थान, मूर्ख मधु दैत्यको मारनेवाले, दूसरोंको मान देने- वाले और खयं मानरहित हैं। आप कामदेवके नाशक, मदसे रहित, मायासे रहित, सुन्दरी लक्ष्मीदेवीके खामी और हाथमें कमल लेनेवाले हैं ॥६॥ आपके नेत्र कमलके समान हैं, आप चौंसठ कलाओंके भण्डार, धनुष धारण करनेवाले, कोसलदेशके खामी और कल्याणकी राशि हैं। राक्षसरूपी बहुत-से मतवाले हाथियोंको मारनेके लिये सिंह हैं। भक्तोंके मनरूपी पवित्र वनमें निवास करनेवाले हैं ॥ ७॥ आप पापरहित, अद्वितीय, दोषरहित, अप्रकट, अजन्मा, सीमारहित, निर्विकार और आनन्दके समुद्र हैं। आप अचल हैं, (पर) एक ही स्थानमें आपका निवास नहीं है-आप सर्वत्र हैं, परिपूर्ण हैं, नीरोग अर्थात् मायाके विकारोंसे रहित हैं और अनादि हैं। आप ही मेघनादके मारनेवाले लक्ष्मण- जीके बडे भाई हैं॥ ८॥ यह तुलसीदास संसारके दुखोसे दुखी, विपद्ग्रस्त, शोकयुक्त और अत्यन्त भयभीत हो रहा है; हे शरणा- गतपालक ! हे परम करुणाके धाम ! हे पृथ्वीपति श्रीरामजी । इस दुनिीतकी रक्षा कीजिये ॥ ९॥ [५७ ] देव- दहि सत्संग निजअंग श्रीरंग! भवभंग-कारणशरण-शोकहारी। यतु भवदंघ्रिपल्लव-समाश्रित सदा, भकिरत, विगतसंशय, मुरारी ॥१॥