पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१०७

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विनय-पत्रिका असुर-सुर, नाग-नर, यक्ष-गंधर्व-खग, रजनिचर, सिद्ध, ये चापि भन्ने। संन-संसर्ग त्रैवर्गपर, परमपद, प्राप्य निःप्राप्यगति त्वयि प्रसन्ने २ वृत्र, बलि, वाण, प्रहलाद, मय, व्याध, गज, गृध्र, द्विजवन्धु निजधर्मत्यागी। साधुपद-सलिल निर्धूत-कल्मप सकल, श्वपच-यवनादि कैवल्य- भागी ॥३॥ शांत,निरपेक्ष, निर्मम,निरामय, अगुण,शब्दब्रह्मकपर, ब्रह्मशानी । दक्ष, समडक, खहक, विगत अति स्वपरमति परमरतिविरति तव चक्रपानी ॥ ४॥ विश्व-उपकारहित व्यग्रचित सर्वदा, त्यक्तमदमन्यु, कृत पुण्यरासी। यत्र तिष्ठन्ति तत्रैव अज शर्व हरि सहितगच्छन्ति क्षीराधिवासी५ वेद-पयसिंध, सुविचारमंदरमहा अखिल-मनिट निर्मथनकर्ता । सार सतसंगमुद्धृत्य इति निश्चितं वदति श्रीकृष्ण वैदर्भिभर्ता ६ शोक-संदेह, भय-हर्ष, तम-तर्षगण साधु-सद्युक्ति विच्छेदकारी। यथा रघुनाथ-सायक निशाचर-चमू-निचय-निर्दलन-पटु-वेग भारी ॥७॥ यत्र कुत्रापि मम जन्म निजकर्मवश भ्रमत जगजोनि संकट अनेकं। तत्र त्वद्भक्ति, सजन, समागम, सदा भवतु मेराम विश्राममेकं ८ प्रवलभव-जनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भकभैषज्यमद्वैतदरसी। संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं, किमपि मति मलिन कह दालतुलसी ॥९॥