पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१०८

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विनय-पत्रिका भावार्थ-हे रमापते ! मुझे सत्संग दीजिये, क्योंकि वह आपकी प्राप्तिका एक प्रधान साधन है, संसारके आवागमनका नाश करनेवाला है और शरणमें आये हुए जीवोंके शोकका हरनेवाला है । हे मुरारी ! जो लोग सदा आपके चरण-पल्लवके आश्रित और आपकी भक्तिमे लगे रहते हैं, उनका अविद्याजनित सन्देह नष्ट हो जाता है ॥१॥ दैत्य, देवता, नाग, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, पक्षी, राक्षस, सिद्ध तथा और भी दूसरे जितने जीव हैं; वे सभी ( आपकी भक्तिमें लगे हुए) संतोंके संसर्गसे अर्थ, धर्म, कामसे परे आपके उस नित्य परमपदको प्राप्त कर लेते है, जो अन्य साधनोंसे नहीं मिल सकता, परन्तु केवल आपके प्रसन्न होनेसे ही मिलता है ॥२॥ वृत्रासुर, वलि, बाणासुर, प्रह्लाद, मय, व्याध (वाल्मीकि ), गजेन्द्र, गिद्ध जटायु और ब्राह्मणो- चित कर्मसे पतित अजामिल ब्राह्मण तथा चाण्डाल, यवनादि भी सतोके चरणोदकसे अपने सारे पापोंको धोकर कल्याण-पदके भागी हो गये ॥ ३॥ वे (साधु कैसे हैं) चित्तसे सारी कामनाएँ निकल जाने- के कारण शान्त, किसी भी वस्तु या स्थितिकी आकांक्षा न रहनेसे निरपेक्ष, ममतासे रहित, उपाधिरहित, तीनों गुणोंसे अतीत, शब्दब्रह्म अर्थात् वेदके जाननेवालोंमे मुख्य और ब्रह्मवेत्ता हैं। जिस कार्यके लिये मनुष्य-देह मिला है, उसे पूरा करनेमें कुशल, सम-द्रष्टा, अपने आत्मखरूपको जाननेवाले, अपनी-परायी बुद्धि अर्थात् भेदबुद्धिसे हत सब कुछ अपने श्रीरामका समझनेवाले और हे चक्रपाणे । वे ससारके भोगोंसे विरक्त और आप परमात्माके अनन्य प्रेमी हैं ॥४॥ संसारके उपकारके लिये उनका चित्त सदा व्याकुल रहता ह, मद और क्रोधको उन्होंने त्याग दिया है और पुण्योंकी बड़ी