पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१२८

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विनय-पत्रिका राग भैरव [६५] राम राम रमु, राम राम रटु, राम राम जपु जीहा । रामनाम-नव-नेह-मेहको मन ! हठि होहि पपीहा ॥१॥ सब साधन-फल कूप-सरित-सर, सागर-सलिल-निरासा । राम-नाम-रति-खाति-सुधा-सुभ-सीकर प्रेमपियासा ॥२॥ गरजि, तरजि, पाषान वरपि पवि, प्रीति परखि जिय जाने ।। अधिक अधिक अनुराग उमँग उर, पर परमिति पहिचान ॥ ३॥ रामनाम-गति रामनाम-मति, रामनाम-अनुरागी। द्वैगये, हैं, जे होहिंगे, तेइ त्रिभुवन गनियत बड़भागी ॥४॥ एक अंग मग अगमुगवन कर, विलमुन छिन छिन छाहे । तुलसी हित अपनो अपनी दिसि, निरुपधि नेम निवाहे ॥ ५॥ भावार्थ-हे जीभ ! तू सदा राम राममें रमा कर, राम राम रटा कर और राम रामका जप किया कर । हे मन ! तू भी रामनाममें प्रेमरूपी नित्य-नवीन मेघके लिये हठ करके पपीहा बन जा ॥१॥ जैसे पपीहा कुऑ, नदी, तालाब और समुद्रतकके जलकी जरा-सी भी आशा न कर केवल खाती-नक्षत्रके जलकी एक प्रेम-बूंदके लिये प्यासा रहता है, ऐसे ही तू भी और सारे साधनो तथा उनके फलोंकी आशा न कर केवल श्रीरामनामके प्रेमरूपी अमृतकी बूंदमें ही प्रीति कर ॥ २॥ पपीहेपर उसका प्रेमी मेघ गरजता है, डॉट बतलाता है, ओले बरसाता है, वज्रपात करता है। इस प्रकार कठिन-से-कठिन परीक्षा करके पपीहेके अनन्य प्रेमको पूर्णरूपसे परखकर जब वह इस बातको जान लेता है कि ज्यो-ज्यों परीक्षा लेता हूँ त्यों-त्यों इस