पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१३८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका होते हैं ।। ३ ।। हे तुलसी ! संसारके तीनों ताप अज्ञानरूपी निद्रासे जागनेपर ही नष्ट होते हैं और तभी श्रीराम-नाममें अहेतुकी खाभाविक विशुद्ध प्रीति उत्पन्न होती है ॥ ४ ॥ राग विभास [७४ ] जानकीसकी कृपा जगावती सुजान जीव, जागि त्यागि मूढ़ताऽनुराग श्रीहरे । करि विचार, तजि विकार, भजु उदार रामचंद्र, भद्रसिंधु दीनबंधु बेद वदत रे ॥१॥ मोहमय कुहू-निसा विसाल काल विपुल सोयो, खोयो सो अनूप रूप सुपन जू परे। अव प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकाश वास- ना, सराग मोह-द्वेष निविड़ तम टरे ॥ २॥ भागे मद-भान चोर भोर जानि जातुधान ___ काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे। देखत रघुवर प्रताप वीते संताप-पाप ताप त्रिविध प्रेम-आप दूर ही करे ॥ ३॥ श्रवन सुनि गिरा गंभीर जागे अति धीर वीर, वर विराग-तोष सकल संत आदरे । तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीवजन बिहाल, भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥४॥ भावार्थ-( श्रीरामनामके आश्रित ) चतुर जीवोंको श्रीरामजीकी कृपा ही (अज्ञानरूपी निद्रासे ) जगाती है, ( अतएव राम-नामके