पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१५७

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विनय-पत्रिका दु.खोंको दूर नहीं किया ॥ ३ ॥ मेरे नेत्र, पैर, हाथ, सुन्दर बुद्धि और बल सभी थक गये हैं। सारा सग मुझसे बिछुड़ गया है। अब तो हे रघुनाथजी ! यह संसारके भयसे व्याकुल और भीत दास आपकी शरण आया है।॥ ४॥ हे नाथ ! जिन गुणोंपर रीझकर आप प्रसन्न होते हैं, वह सब तो मैं भूल चुका हूँ। अब हे प्रभो ! इस तुलसीदासको अपने दरवाजेपर पड़ा रहने दीजिये ॥ ५॥ [९२] माधवजू, मोसम मंद न कोऊ। जद्यपि मीन-पतंग हीनमति, मोहि नहिं पूजे ओऊ ॥१॥ रुचिर रूप-आहार-वस्य उन्ह, पावक लोह न जान्यो। देखत विपति विषय न तजत हों, ताते अधिक अयान्यो ॥ २॥ महामोह-सरिता अपार मह, संतत फिरत बह्यो । श्रीहरि-चरन-कमल-नौका तजि, फिरि फिरि फेन गह्यो ॥३॥ अस्थि पुरातन छुधित स्वान अति ज्यो भरि मुख पकरै। निज तालूगत रुधिर पान करि, मन संतोष धरै ॥ ४॥ परम कठिनभव-ब्याल-असित हौं त्रसित भयो अति भारी। चाहत अभय भेक सरनागत, खगपतिनाथ विसारी॥५॥ जलचर-बृद जाल-अंतरगत होत सिमिटि इक पासा। एकहि एक खात लालच-बस, नहि देखत निज नासा ॥ ६॥ मेरे अघ सारद अनेक जुग, गनत पार नहिं पावै । तुलसीदास पतित-पावन प्रभु यह भरोस जिय आवै ॥ ७॥ भावार्थ-हे माधव ! मेरे समान मूर्ख कोई भी नहीं है । यद्यपि मछली और पतग हीनबुद्धि हैं, परन्तु वे भी मेरी बराबरी नहीं कर