पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/१७५

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१८० विनय-पत्रिका नामकी कानि पहिचानि पन आपनो, ग्रसित कलि-व्याल राख्यो सरन सोऊ ॥ ६॥ भावार्थ-महाराज श्रीरामचन्द्रजीने जिसका आदर किया वही धन्य है। वही भारी यानी महिमान्वित, गुणोंका भण्डार, सर्वज्ञ, पुण्यवान्, वीर, सुशील और साधु है, उसके समान कोई भी नहीं है ॥ १ ॥ पाषाणकी अहल्या, निषाद, बंदर, रीछ, राक्षस, शबरी, जटायु-ये सब शम, दम, दया और दान आदि गुणोंसे बिल्कुल हीन थे; परन्तु श्रीराम-नाम स्मरण करनेसे श्रीरामजीने इन सबको ऐसा परम पवित्र बना दिया कि ( आज ) उनके गुणोंका गान करनेसे मनुष्य संसार- सागरसे पार हो जाते हैं ॥ २॥ वाल्मीकि व्याधने कौन-से पापकी इच्छा बाकी रक्खी थी ? पिंगला वेश्याने अपनी बुद्धि भक्तिमे कब लगायी थी ? अजामिल पापीने कौन-सा सोमयज्ञ किया था ? और गजराज कहॉका अश्वमेध करनेवाला था ? ॥ 3 ॥ पाण्डवों. गोपियों. विदुर और कुब्जामें पवित्रताका लेश भी कहाँ था, परन्तु आपने इन सबको पवित्र कर लिया, प्रेम देखकर श्रीकृष्णरूप आपने इनको अपना लिया, जिससे इनका सुन्दर यश (आज) ससारमे विष्णु और शिवक यशके समान छा रहा है॥४॥ कोल, खस, भील और यवनादि दुष्टोंमें ऐसा कौन है जिसने रामनाम उच्चारण करनेपर नीच होकर भी ऊँचे-से-ऊँचा पद न पाया हो ? दीनोंके दुःखका नाश करनेवाले, लक्ष्मीजीके पति, करुणाके मन्दिर, पतितोंको पावन करनेवाले श्रीरामजीका यश वेदोंने गाया है ॥ ५॥ ( औरोंकी बात जाने दीजिये ) तीनों लोकों और तीनों कालोंमें तुलसी-सरीखा मन्दबुद्धि, कुटिल और दुट-शिरोमणि कोई नहीं हुआ, परन्तु अपने नामकी