पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२३

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विनय पत्रिका धर्म, कैवल्य सुख (मोक्ष) और सुन्दर सौभाग्य आदि सब सहज ही मिल जाते हैं, तो भी खेद है कि मूर्ख मनुष्य आपकी चरणसेवासे मुँह मोडकर ससारके विकट पयपर इधर-उधर भटकते फिरते हैं ॥ ८॥ हे शम्भो । हे कामारि !! मैं नट-बुद्धि अत्यन्त दुट, काटोम पड़ा हुआ, दुखी तुलसीदास आपकी शरण आया हूँ, आप मुझे श्रीरामक चरणारविन्दमें ऐमी अनन्य एवं अटल भक्ति दीजिये, जिससे भेदरूप मायाका नाश हो जाय ॥९॥ भैरवरूप शिव-स्तुति [११] देव, भीषणाकार, भैरव, भयंकर, भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति, विपति-हर्ता। मोह-मूषक-मार्जार, संसार-भय-हरण, तारण-तरणअभय-कर्ता । अतुल बल, विपुल विस्तार, विग्रह गौर अमल अति धवल धरणीधराम । शिरसि संकुलित-कल-जुट पिंगलजटा, पटल शत-कोटि- विधुच्छटाभं ॥२॥ भ्राज विबुधापगा आप पावत परम, मौलि-मालेव शोभा विचित्र । ललिनलल्लाटपरराजरजनीशकल,कलाधर,नौमि हर धनद-मित्र। इंदु-पावक-भानु नयन, मर्दन-मयन, गुण-अयन ज्ञान-विज्ञान-रूपं । रमण-गिरिजा, भवन भूधराधिप सदा, श्रवण कुंडल, वदनछवि ___ अनूपं ॥४॥ चर्म-असि-शुल-धर, डमरु-शर-चाप-कर यान वृषभेश, करुणा- निधानं । जरत सुर-असुर, नरलोक शोकाकुलं मृदुल चित, अजित, कृत गरलपानं ॥५॥