पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२४३

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विनय-पत्रिका २४८ तो सो तुही न दूसरो नत-सोच-विमोचन ॥४॥ पराधीन देव दीन हो, स्वाधीन गुसाई । बोलनिहारे सों फरै चलि विनयकी झाई ॥ ५॥ आपु देखि मोहि देग्निये जन मानिय साँचो। चड़ी ओट रामनामकी जेहि लई सो वॉचो॥६॥ रहनि रीति राम रावरी नित हिय हुलसी है। ज्यों भाव त्यों करु कृपा तेरो तुलसी है ॥७॥ भावार्थ-कहाँ जाऊँ ! किससे कहूँ ? मुझे कोई और और ही नहीं । इस तेरे गुलामने तो तेरे ही दरवाजेपर ( पडे-पड़े) जिन्दगी काटी है ॥ १॥ मैंने तो जो अपनी करनी बिगाड़ी सो हे नाथ! दुःखोंसे घबराया हुआ होनेके कारण बिगाडी । परन्तु हे कृपानिधे ! यदि व भी मेरी करनीकी ओर देखकर फल देगा तो कैसे काम चलेगा? ॥२॥ हे रघुकुलमें श्रेष्ठ ! जबतक (इस जीवकी ओर कृपादृष्टिसे) नहीं देखेगा, तबतक नित्य ही खोटे दिन, नित्य ही बुरी दशा, नित्य ही दुःख और नित्य ही दोष लगे रहेंगे ॥ ३ ॥ मैं जो तुझे पीठ दिये फिरता हूँ, तुझसे विमुख हो रहा हूँ, सो मैं तो दृष्टिहीन हूँ, अन्धा हूँ, अज्ञानी हूँ पर तू तो सारे विश्वका द्रष्टा है ! तू मुझसे विमुख कैसे होगा ? तुझ-सा तो तू ही है, तेरे सिवा दीन-दुखियोंके शोक हरनेवाला दूसरा कोई नहीं है ॥४॥ हे देव ! मैं परतन्त्र हूँ, दीन हूँ, पर तू तो खतन्त्र है, खामी है। तेरी बलिहारी ! चैतन्यरूप बोलनेवालेसे उसकी परछाई क्या विनय कर सकती है ॥ ५॥ अतएव पहले अपनी ओर देख, फिर मेरी ओर देख, तभी इस दासको सच्चा मानना । राम-नामकी ओट बडी भारी है। जिस किसीने भी ."