पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५

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विनय-गत्रिका ज्ञान-विज्ञानरूप है। पार्वतीक साय आप शिकार करते और मदा ही पर्वतराज केटाश आपका भान है। भारत कानोंग कुराला और आपके मुखकी सुन्दरता अनुपम ॥ ४ ॥ अपनाउ,तलार और शूल धारण किये हुए आपके हाथों में उगार, याण और धनुर हैं। बैल आपकी सारी है और आप करुणाके गनाने ।। आरमी करुणाका इसीसे पता लगता है कि आप समुझसे निकले उपभयानक अजेय विपकी ज्वालामे देवता, राक्षस और मनुष्यगेरुको जलता हुआ और शोकम व्याकुल देखकर करुणाके कम होकर उसे स्वयंफ गये ॥ ५॥ भस्म आपके शरीरका भूषण है, आप वाघबर धारण किये हुए हैं। आपने साँपों और नरमुण्डोंकी माला हदयपर धारण कर रक्खी है । डाकिनी, शाकिनी, खेचर (आकाशमें विचरनेवाली दुष्ट आत्माओं ), भूचर (पृथ्वीपर विचरनेवाले भूत-प्रेत आदि )तया यन्त्र मन्त्रका आप नाश करनेवाले हैं। प्रबल पापोंको पलभरमें नर कर डालते हैं ॥ ६॥ आप कालके भी महाकाल हैं, कलिकालरूपी सोंके लिये आप गरुड़ हैं। त्रिपुरासुरका मर्दन करनेवाले तया और बड़े-बड़े भयानक कार्य करनेवाले हैं। समस्त लोकोंके नाश करने- चाले महाप्रलयके समय अपने त्रिशूलकी नोकसे दिग्गजों को छेदकर आप गुणातीत होकर नृत्य करते हैं ॥७॥ इस पाप-सन्तापसे पूर्ण भयानक ससारमें मैं दीन होकर चौरासी लाग्य योनियों में भटक रहा है, मुझे कोई भी बचानेवाला नहीं है । हे भैरवरूप! हे रामरूपी रुद्र !! आप ही मेरे वन्धु, गुरु, पिता, माता और विधाता हैं । मेरी रक्षा कीजिये ॥ ८॥ जिनके गुणों का निर्मल बुद्धिवालो सरस्वती, वेद और नारद आदि ब्रह्मज्ञानी तथा शेषजी सदा गान करते हैं, तुलसीदास