पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५४

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२५९ विनय-पत्रिका नाम लेत दाहिनो होत मन, बाम विधाता बामको। कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सूधे नामको ॥२॥ भलो लोक-परलोक तासु जाके बल ललित-ललामको। तुलसी जग जानियत नामते सोच न कूच मुकामको ॥ ३॥ भावार्थ-कलियुगमें श्रीराम-नाम ही कल्पवृक्ष है। क्योंकि वह दारिद्रय, दुर्भिक्ष, दुःख, दोष और धनघटा ( अज्ञान ) तथा कडी धूप ( विषय-विलास ) का नाश करनेवाला है ॥ १॥ राम-नाम लेते ही प्रतिकूल विधाताका प्रतिकूल मन भी अनुकूल हो जाता है। मुनीश्वर वाल्मीकिने उलटे अर्थात् 'मरा-मरा' नामकी महिमा गायी है और शिवजीने सीधे राम-नामका माहात्म्य बताया है । तात्पर्य यह है कि उलटा नाम जपते-जपते वाल्मीकि व्याधसे ब्रह्मर्षि हो गये और शिवजी सीधा नाम जपनेसे हलाहल विषका पान कर गये तथा स्वयं भगवत्स्वरूप माने गये ॥ २॥ जिसे इस परम सुन्दर राम-नामका बल है, उसके लोक और परलोक दोनों ही सुखमय हैं। है तुलसी ! राम-नामका बल होनेपर न तो इस संसारसे जानेमें सोच प्रतीत होता है और न यहाँ रहनेमें ही । भाव यह कि उसके लिये परमानन्दमें मनरहने के कारण जीवन-मरण समान हो जाते हैं ॥३॥ [१५७ ] सेइये सुसाहिब राम सो।। सुखद सुसील सुजान सूर सुचि, सुंदर कोटिक काम सो॥१॥ सारद सेस साधु महिमा कहे, गुनगन-गायक साम सो। सुमिरि सप्रेम नाम जासो रति चाहत चंद्र-ललाम सो॥२॥ गमन बिदेसनलेस कलेसको, सकुचत सकृत प्रनाम सो। साखी ताको विदित विभीषन, बैठो है अविचल धाम सो ॥३॥ सुमिरि सप्रेम नाम कलेसको, सका है अविचल