पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५८

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२६३ विनय-पत्रिका मोद-मंगल-मूल अति अनुकूल निज निरजोसु । रामनाम प्रभाव सुनि तुलसिहुँ परम परितोसु ॥५॥ भावार्थ-हे प्रभो ! सब मेरा ही दोष है । आप तो शीलके समुद्र, कृपाल, अनाथोंके नाथ और दीन-दुखियोंके पालने-पोसने- वाले हैं ॥ १॥ मेरे भेष ओर वचनों में तो वैराग्य दीखता है, किन्तु मेरा मन पापों और अवगुणोंका खजाना है । हे रामजी ! आपके प्रेम और विश्वासके लिये मेरा मन पोला है अर्थात् उसमें तनिक भी प्रेम और विश्वास नहीं है। हॉ, कपटकी करनीके लिये तो खूब ठोस है, कपट-ही-कपट भरा है ॥ २॥ जैसे खरगोस सियारकी सेवा करके सिंहकी कीर्ति चाहता है, वैसे ही मैं कुसङ्गतिसे तो प्रेम करता हूँ और साधुओंके सङ्गमें झुंझलाया करता हूँ। (जैसे खरगोश गीदड़के बलपर सिंहकी-सी कीर्ति चाहता है, पर सियार तो उसे खा ही डालता है। कीर्तिके बदले प्राण ही चले जाते हैं । इसी प्रकार जो कुसङ्गमें पडकर कीर्ति चाहता है, उसे कीर्तिका मिलना तो दूर रहा, उसके सद्गुणोंका भी नाश हो जायगा, जिससे बारंबार मृत्युके चक्रमें जाना पड़ेगा ) ॥ ३ ॥ शिवजीका उपदेश यही है कि 'नित्य जीभसे राम-वामका कीर्तन करो ।' कलियुगमें दम्भसे भी लिया हुआ राम-नाम अगस्त्यकी तरह दुःखसागरको सोख लेता है ( दम्भसे लिया हुआ नाम भी लोक-परलोक दोनोंकी चिन्ताओंको दूर कर देता है)॥ ४ ॥ वह राम-नाम आनन्द और कल्याणकी जड़ है। श्रीराम-नाम अपने लिये ऐसा अत्यन्त अनुकूल है कि जिसकी किसी अनुकूलतासे तुलना नहीं हो सकती । राम-नामका