पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२५९

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२६४ विनय-पत्रिका ऐसा प्रभाव सुनकर तुलसीको भी परम सन्तोष है ( क्योंकि यही उसका अवलम्बन है ) ॥ ५॥ [१६०] मैं हरि पतित-पावन सुने। मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ वानक वने ॥१॥ व्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने । और अधम अनेक तारे जात कापै गने ॥ २॥ जानि नाम अजानि लीन्हें नरक सुरपुर मने। दासतुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ ३॥ भावार्थ-हे हरे ! मैंने तुम्हें पतितोंको पवित्र करनेवाला सुना है । सो मैं तो पतित हूँ और तुम पतितपावन हो; बस, दोनोंके बानक बन गये, दोनोंका मेल मिल गया । ( अब मेरे पावन होनेमें क्या सन्देह है १ ) ॥ १ ॥ वेद साक्षी दे रहे हैं कि तुमने व्याध ( वाल्मीकि ), गणिका ( पिंगला वेश्या ), गजेन्द्र और अजामिलको तथा और भी अनेक नीचोंको संसार-सागरसे पार कर दिया है, जिनकी गिनती ही किससे हो सकती है ॥ २॥ जिन्होंने जानकर या बिना जाने तुम्हारा नाम ले लिया, उन्हें नरक और वर्गमें जानेकी भनाई कर दी गयी है अर्थात् वे भवसागरसे पार होकर मुक्त हो

  • आजकलकी प्रचलित प्रतियोंमें प्रायः 'नरक जमपुर मने पाठ

है, परन्तु मैंने एक प्राचीन प्रतिमें 'नरक सुरपुर मने पाठ देखा था और कमालम होता है, क्योंकि नरक और जमपुर एकार्थवाचक होनेसे पाक्ति दोष आता है। इसके सिवा बिना जाने भी अन्तकालमें भगवानका नाम लेनेवालेकी मुक्ति बतायी गयी है, न कि स्वर्गगमन; इसलिये यही पाठ ठीक है। -