पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२७५

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विनय-पत्रिका २८०

सारी सेवक वस्सलता और दूसरी ओर अपना जरा-सा खामीद्रोह रखकर तौला, तब देखनेपर मेरी ही ओरका पलड़ा भारी निकला ॥ ६ ॥ इतनेपर भी हे नाथ! आप कृयाकर मेरा हित ही करते चले आ रहे हैं, करते हैं और करेंगे। तुलसी अपनी ओरसे जानता है कि इस कनौडेका ( एहसानसे दवे हुएका ) प्रभु ही पालन करेंगे ॥ ७॥

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कबहुँक हो यहि रहनि रहोंगो। श्रीरघुनाथ-कृपालु-कृपाते संत-सुभाव गहोंगो ॥१॥ जथालाभसंतोष सदा, काहसों कछु न चहाँगो। पर-हित-निरत-निरंतर, मन क्रम बचन नेम निवहींगो ॥ २ ॥ परुष बचन अति दुसह श्रवन सुनि तेहि पाचक नदहोंगो। विगत मान, सम सीतल मन, परशुन नहिं दोषकहींगो॥३॥ परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख सम वुद्धि सहोंगो।। तुलसिदास प्रभु यहि पथरहि अविचल हरि-भगतिलहोंगो॥ ४॥

भावार्थ-क्या मैं कभी इस रहनीसे रहूंगा? क्या कृपाल श्रीरघुनाथजीकी कृपासे कभी मैं संतोंका-सा खभाव ग्रहण करूँगा॥१॥ जो कुछ मिल जायगा उसीमें सन्तुष्ट रहूँगा, किसीसे (मनुष्य या देवतासे ) कुछ भी नहीं चाहूंगा । निरन्तर दूसरोंकी भलाई करनेमें ही लगा रहूंगा। मन, वचन और कर्मसे यम-नियमों का पालन ॥२॥कानोंसे अति कठोर और असह्य वचन सुनकर भी उससे 'अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान--ये दस यम-नियम हैं।