पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३०६

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३११ विनय-पत्रिका अवस्था में तो कुटिल कलियुगने तुझको बीचमे ही ठग लिया (जिससे लोक- परलोक दोनों ही बिगड़ गये)॥१॥ (भगवान्के प्रेमसे बिहीन लोगों के लिये) वर्ण और आश्रनके धर्म केवल पोथियों और पुराणों में ही लिखे पाये जाते हैं । उनके अनुसार कर्तव्य कोई नहीं करता, ऐसे कर्तव्य- हीन कोरे भेष वैसे ही हैं जैसे बिना प्राणों के शरीर हों। (उनसे कोई लाभ नहीं)॥२॥ सुनते हैं कि वेदोंमें जितने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध ( यज्ञ आदि) साधन हैं, वे सब अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष-चारोंको देनेवाले हैं; किन्नु बिना श्रीराम-प्रेमके उन सबका जानना-मानना वैसा ही है जैसे बिना पानीके तालाब और नदियाँ । सारांश यह कि भगवत्- प्रेम विहीन सभी क्रियाएँ व्यर्थ हैं ॥ ३॥ मुक्तिके अनेक मार्ग हैं और भाँति-भाँतिके साधन हैं; किन्तु हे तुलसी! तू तो मेरे कहनेसे दिन-रात केवल राम-नामका ही जप किया कर ( तेरा तो इसीसे कल्याण हो जायगा) ॥ ४ ॥ [ १९३ ] अजहुँ आपने रामके करतब समुझत हित होइ । कहँ तू, कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ ॥१॥ रीझि निवाज्यो कहिं तू, कर खीझि दई तोहिं गारि । दरपन बदन निहारिक, सुविचारि मान हिय हारि ॥२॥ विगरी जनम अनेककी सुधरत पल लगै न आधु । 'पाहि कृपानिधि' प्रेमसों कहे को न राम कियो साधु ॥३॥ वालमीकि केवट कथा, कपि-भील-भालु-सनमान । सुनिसनमुख जोन रामसो, तिहिको उपदेसहि ग्यान ॥४॥ का सेवा सुग्रोवको, का प्रीति-रीति-निरबाहु ।