पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३५८

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३६३ विनय-पत्रिका जननी-जनक तज्योजनमि, करम विनु विधिहु सृज्यो अवडेरे। मोहुँसो कोउ-कोउ कहत रामहि को, सो प्रसंग फेहि केरे ॥ २॥ फिर यौललात विनु नाम उदर लगि,दुखउ दुखित मोहि हेरे। नाम-प्रसाद लहत रसाल-फल अब हों वधुर वहेरे ॥ ३॥ साधत साधु लोक-परलोकहि, सुनि गुनि जतन घनेरे । तुलसीके अवलंब नामको, एक गॉठि कह फेरे ॥ ४॥ भावार्थ-हे रामजी! आपका नाम ही मेरा तो कल्याण करने- चाला है, यह बात मैं हाथ उठाकर खार्थके और परमार्थके सभी संगी-साथियोंसे ( परिवारके लोगोंसे और साधकोंसे ) पुकारकर कहता हूँ (घोषणा कर रहा हूँ)॥१॥ माता-पिताने तो मुझे उत्पन्न करके ही छोड़ दिया था, ब्रह्माने भी अभागा और कुछ बेढब-सा बनाया था। फिर भी कोई-कोई मुझे 'रामका' ( दास) कहते हैं, ___ यह किस अभिप्रायसे कहते हैं ? ( यह राम-नामका ही प्रताप है)॥२॥ जब मैं राम-नामके शरण नहीं हुआ था तब मैं पेट भरनेको (द्वार-द्वारपर ) ललचाता फिरता था। मेरी ओर देखकर दुखको भी दुःख होता था ( मेरी ऐसी बुरी दशा थी)। श्रीरामकी कृपासे पहले मेरे लिये जो बवूल और बहेड़ेके वृक्ष थे, उन्हीं पेड़ोंसे मुझे अब आमके फल मिल रहे हैं । ( जहाँ जगत् दु.खोंसे भरा भासता था वहाँ आज सब 'सीय-रामरूप' दीखनेके कारण वही सुखमय हो गया है) ॥ ३॥ संतजन तो (शास्त्रोंको ) सुनकर और (उसके अनुसार ) मननकर अनेक साधनोंसे अपना लोक और परलोक बना लेते हैं, परंतु तुलसीके तो एक राम-नामका ही अबलम्बन है। जैसे गाँठ तो एक ही होती है, लपेटे चाहे जितने हों, ( इसी प्रकार साधन चाहे जितने हों, सबका आधार तो एक राम-नाम ही है) ॥४॥